कोयला खदानों को बचाने बदला एनएच-130ए का मार्ग, अब 23.214 हेक्टेयर वन भूमि पर सड़क!
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एनएचएआई की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा—धरमजयगढ़ वन क्षेत्र से गुजरेगा बदला हुआ मार्ग, खनन क्षेत्र से टकराव के कारण पुराने मार्ग को बदलने का उल्लेख

धरमजयगढ़ – भारतमाला परियोजना के तहत निर्माणाधीन उरगा–पत्थलगांव एनएच-130ए चार लेन सड़क को लेकर भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की एक आधिकारिक रिपोर्ट ने मार्ग परिवर्तन को लेकर कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखे हैं। एनएचएआई, परियोजना क्रियान्वयन इकाई कोरबा द्वारा तैयार “वन क्षेत्र में परियोजना के स्थान का औचित्य” संबंधी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि प्रस्तावित नए मार्ग के कारण धरमजयगढ़ वन मंडल क्षेत्र की लगभग 23.214 हेक्टेयर वन भूमि प्रभावित होगी।
रिपोर्ट के अनुसार एनएच-130ए के किलोमीटर 114+410 से किलोमीटर 121+450 तक लगभग 7.45 किलोमीटर हिस्से का मार्ग बदला गया है। एनएचएआई ने इसके पीछे प्रमुख कारण पुराने मार्ग का भविष्य के कोयला खनन क्षेत्र से टकराव बताया है।
कोयला खनन क्षेत्र से बचाने बदला गया सड़क मार्ग
एनएचएआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि मूल सड़क मार्ग ऐसे क्षेत्र से गुजर रहा था, जिसे भविष्य में कोयला खनन के लिए उपयोग किया जाना था। इससे सड़क और प्रस्तावित खनन गतिविधियों के बीच टकराव तथा कोयला संसाधनों के उपयोग में बाधा की आशंका थी। इसके बाद स्थल निरीक्षण और संबंधित पक्षों के साथ चर्चा के बाद सड़क मार्ग में परिवर्तन का निर्णय लिया गया।
रिपोर्ट में 09 फरवरी 2024 को कोयला मंत्रालय में हुई बैठक तथा 21 अप्रैल 2025 को हुई बैठक का भी उल्लेख है। इसके बाद सड़क के बदले हुए मार्ग को सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय से स्वीकृति मिलने की बात कही गई है।
तीन कोयला खंडों का उल्लेख
इस पूरे मामले में रिपोर्ट का आठवां बिंदु सबसे महत्वपूर्ण है। इसमें एनएचएआई ने कहा है कि निर्माणाधीन एनएच-130ए का संबंधित हिस्सा दुर्गापुर-द्वितीय/ताराईमार और दुर्गापुर-द्वितीय/सरिया कोयला खंडों से होकर गुजर रहा था। इन क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए सड़क मार्ग को पुनः निर्धारित करने की बात कही गई है।
रिपोर्ट में शेरबंद कोयला खंड का भी स्पष्ट उल्लेख है। एनएचएआई ने कहा है कि सड़क मार्ग को संबंधित कोयला खंडों की सीमाओं के अनुरूप बदला गया, ताकि कोयले के खनन योग्य भंडार के अप्राप्य होने की स्थिति को कम किया जा सके।
सरल शब्दों में इसका अर्थ है कि सड़क के कारण भविष्य में खनन योग्य कोयले का ऐसा हिस्सा न छूट जाए, जिसे सड़क निर्माण के बाद निकालना संभव या व्यावहारिक न रहे।
कोयला बचाने के लिए जंगल की कीमत क्यों?
एनएचएआई की इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद सबसे महत्वपूर्ण विषय यह बन गया है कि यदि सड़क का मूल मार्ग कोयला खनन क्षेत्र से टकरा रहा था, तो क्या कोयला संसाधनों को बचाने के लिए सड़क को वन क्षेत्र की ओर स्थानांतरित किया गया?
यदि ऐसा हुआ है तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि मार्ग परिवर्तन से पहले वन क्षेत्र से बाहर कितने वैकल्पिक मार्गों का अध्ययन किया गया था और उन्हें किन कारणों से अस्वीकार किया गया।
इसके साथ ही 23.214 हेक्टेयर वन भूमि के चयन का आधार भी महत्वपूर्ण है। क्या प्रस्तावित मार्ग के लिए वन भूमि की आवश्यकता को न्यूनतम रखने का कोई अध्ययन किया गया था, यह भी संबंधित अभिलेखों से स्पष्ट होना बाकी है।
बैठकों और स्वीकृति के दस्तावेज अब महत्वपूर्ण
एनएचएआई की रिपोर्ट में 09 फरवरी 2024 और 21 अप्रैल 2025 की कोयला मंत्रालय की बैठकों तथा 26 नवंबर 2025 को सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय से मिली मार्ग स्वीकृति का उल्लेख किया गया है। ऐसे में इन बैठकों की कार्यवाही, मार्ग परिवर्तन से संबंधित प्रस्ताव, वैकल्पिक मार्गों के अध्ययन, कोयला खंडों के नक्शे और वन भूमि से संबंधित अभिलेख पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकते हैं।
विशेष रूप से शेरबंद कोयला खंड और नए एनएच-130 ए मार्ग के बीच वास्तविक भौगोलिक संबंध भी जांच का महत्वपूर्ण विषय है।
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