प्रार्थना सभा में बच्चे धूप-बारिश में , शिक्षक छांव में……….क्या यही है संवेदनशीलशीलता ?
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धरमजयगढ़ – छत्तीसगढ़ के शासकीय विद्यालयों में प्रार्थना, वंदना और मंत्रोच्चार से जुड़ी व्यवस्था इन दिनों चर्चा में है। स्कूल शिक्षा विभाग ने 12 जून 2026 को जारी निर्देश में शैक्षणिक सत्र 2026-27 से विद्यालयों की दैनिक गतिविधियों में राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, दीप मंत्र, सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र, शांति मंत्र सहित अन्य निर्धारित गतिविधियों को शामिल करने के निर्देश दिए हैं। इस आदेश को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका भी दायर हुई थी, जिसे न्यायालय ने 2 जुलाई 2026 को समयपूर्व मानते हुए खारिज कर दिया। न्यायालय ने यह भी कहा कि आदेश में विद्यार्थियों को उनकी धार्मिक आस्था या अंत:करण के विरुद्ध बाध्य करने वाला कोई स्पष्ट प्रावधान सामने नहीं आया है और नैतिक शिक्षा पर संविधान में रोक नहीं है।

सरकार के निर्देश का उद्देश्य विद्यालयों में अनुशासन, नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना को बढ़ावा देना बताया गया है। लेकिन किसी भी व्यवस्था की वास्तविक सफलता केवल आदेश जारी होने से नहीं, बल्कि उसके जमीनी क्रियान्वयन से तय होती है। यहीं से एक महत्वपूर्ण मानवीय और प्रशासनिक पहलू सामने आता है—क्या प्रार्थना सभा के दौरान बच्चों और शिक्षकों के लिए परिस्थितियां समान होनी चाहिए ?

धूप, उमस या बारिश में बच्चे और छांव में शिक्षक
कई विद्यालयों से सामने आने वाली तस्वीरों और स्थानीय स्तर पर मिल रही शिकायतों के अनुसार, प्रार्थना सभा के दौरान छोटे-छोटे बच्चों को खुले मैदान में निर्धारित अवधि तक अनुशासन के साथ खड़ा रहना पड़ता है। गर्मी, तेज धूप, उमस अथवा बारिश जैसी परिस्थितियों में यह अवधि बच्चों के लिए असुविधाजनक हो सकती है।
दूसरी ओर, कुछ विद्यालयों में शिक्षक, संस्था प्रमुख अथवा अन्य कर्मचारी भवन के बरामदे, शेड या अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थान पर खड़े होकर प्रार्थना सभा में शामिल होते दिखाई देते हैं। यदि किसी विद्यालय में वास्तव में ऐसी व्यवस्था है, तो यह केवल अनुशासन का विषय नहीं रह जाता, बल्कि विद्यालयी संस्कृति और नेतृत्व के उदाहरण से भी जुड़ जाता है।
बच्चों को जब समानता, अनुशासन, सहयोग और संवेदनशीलता का पाठ पढ़ाया जाता है, तब विद्यालय परिसर में इन मूल्यों का व्यवहारिक प्रदर्शन भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है। शिक्षक यदि विद्यार्थियों के साथ समान परिस्थिति में खड़े होते हैं, तो उनके लिए यह केवल प्रार्थना सभा में सहभागिता नहीं, बल्कि व्यवहार के माध्यम से शिक्षा देने का अवसर बन सकता है।
गुरु आगे बढ़े तो अनुशासन का अर्थ भी बदलेगा
विद्यालय में शिक्षक केवल पाठ पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि विद्यार्थियों के लिए व्यवहार और आचरण का प्रत्यक्ष उदाहरण भी होता है। ऐसे में यदि प्रार्थना सभा खुले मैदान में हो रही है और मौसम प्रतिकूल है, तो शिक्षक भी विद्यार्थियों के साथ उसी परिस्थिति में मौजूद रहें—इससे बच्चों के बीच सहभागिता और अपनत्व की भावना मजबूत हो सकती है।
इसके विपरीत, यदि विद्यार्थियों के लिए एक नियम और शिक्षकों के लिए दूसरी सुविधा दिखाई देती है, तो बच्चों के मन में व्यवस्था को लेकर अलग संदेश जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। खासकर छोटे बच्चों के लिए शिक्षक का व्यवहार किसी भी लिखित पाठ से अधिक प्रभावशाली होता है।
समानता का पाठ केवल किताबों तक सीमित न रहे
विद्यालयों में विद्यार्थियों को समानता और संवेदनशीलता का पाठ पढ़ाया जाता है। लेकिन इन मूल्यों की वास्तविक शिक्षा तब होती है जब उन्हें विद्यालय के रोजमर्रा के व्यवहार में भी देखा जा सके।
प्रार्थना सभा इसी का एक उदाहरण बन सकती है। यदि बच्चे धूप में खड़े हैं तो शिक्षक भी उनके साथ खड़े हों, और यदि मौसम इतना प्रतिकूल है कि बच्चों को खुले मैदान में खड़ा करना उचित नहीं है तो पूरी प्रार्थना सभा को सुरक्षित स्थान पर आयोजित किया जाए। इससे व्यवस्था में समानता और मानवीय संवेदनशीलता दोनों का संदेश जाएगा।
मौसम के अनुसार व्यवस्था में हो लचीलापन
प्रार्थना सभा का उद्देश्य बच्चों को अनुशासन, नैतिकता और सकारात्मक मूल्यों से जोड़ना है। ऐसे में मौसम की परिस्थितियों को नजरअंदाज करना उद्देश्य के विपरीत परिणाम दे सकता है।
तेज धूप, अत्यधिक उमस या बारिश की स्थिति में विद्यालयों को परिस्थितिनुसार प्रार्थना सभा को कक्षाओं, बरामदे, सभागार अथवा किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर आयोजित करने की व्यावहारिक छूट दी जा सकती है। छोटे बच्चों, दिव्यांग विद्यार्थियों और स्वास्थ्य संबंधी संवेदनशीलता वाले विद्यार्थियों के लिए विशेष सावधानी की व्यवस्था भी उपयोगी हो सकती है।
सरकार और शिक्षा विभाग के लिए विचारणीय पहलू
प्रार्थना सभा को केवल निर्धारित गतिविधियों की सूची पूरी करने तक सीमित रखने के बजाय इसे विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास और मानवीय मूल्यों से जोड़ने की आवश्यकता है। इसके लिए शिक्षा विभाग की ओर से विद्यालयों को स्पष्ट व्यावहारिक दिशा-निर्देश दिए जा सकते हैं कि प्रतिकूल मौसम में विद्यार्थियों को खुले मैदान में लंबे समय तक खड़ा न रखा जाए और प्रार्थना सभा के दौरान शिक्षक एवं कर्मचारी भी यथासंभव विद्यार्थियों के साथ समान परिस्थिति में सहभागिता करें।
आखिरकार, विद्यालय में अनुशासन जरूरी है, लेकिन अनुशासन की पहली शर्त संवेदनशीलता है। प्रार्थना के दौरान बच्चों से अनुशासन और सहभागिता की अपेक्षा की जाती है तो उनके साथ खड़े होने का दायित्व भी व्यवस्था और शिक्षकों का होना चाहिए। गुरु और शिष्य के बीच सम्मान का रिश्ता केवल मंच से दिए गए निर्देशों से नहीं, बल्कि उस व्यवहार से मजबूत होता है जो बच्चे अपनी आंखों के सामने देखते हैं।
प्रार्थना की अवधि कितनी हो, कौन-सी गतिविधियां हों—यह प्रशासनिक व्यवस्था का विषय हो सकता है; लेकिन बच्चों को किस परिस्थिति में खड़ा किया जाए, यह निश्चित रूप से मानवीय संवेदनशीलता का विषय होना चाहिए।

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