ए.के.एस. विश्वविद्यालय में केंचुआ खाद इकाई बना रही किसानों और छात्रों को आत्मनिर्भर
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सतना। ए.के.एस. विश्वविद्यालय के कृषि एवं तकनीकी संकाय में संचालित वर्मीकम्पोस्ट (केंचुआ खाद) इकाई पिछले लगभग 8 वर्षों से सफलतापूर्वक कार्य कर रही है। यह इकाई प्राकृतिक और कार्बनिक खेती को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है

और किसानों के लिए एक उपयोगी मॉडल बनकर उभरी है।कृषि विशेषज्ञों के अनुसार वर्मीकम्पोस्ट मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों को सक्रिय कर उसकी उर्वरता बढ़ाती है। यही कारण है कि भारत सरकार, केंद्रीय कृषि मंत्रालय एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा भी इसके उपयोग को प्रोत्साहित किया गया है। यह खाद सब्जियों, फलों, फूलों एवं अन्य फसलों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो रही है

।विश्वविद्यालय परिसर में इस इकाई का उपयोग कृषि छात्र विभिन्न शोध कार्यों में कर रहे हैं, जिससे उन्हें व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त हो रहा है। इस पहल से लगभग 400 छात्र-छात्राएं, किसान बंधु एवं गार्डनिंग के शौकीन लाभान्वित हो रहे हैं।इस इकाई का संचालन श्री राहुल कलर द्वारा किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि केंचुआ खाद बनाना बेहद सरल और कम लागत वाला कार्य है। किसान खेती के साथ-साथ पशुपालन से प्राप्त गोबर, हरी व सूखी घास तथा फसल अवशेषों का उपयोग कर इसे आसानी से तैयार कर सकते हैं।विश्वविद्यालय में लगभग 50 बेड की व्यवस्था है, जिनका आकार 12 फीट लंबा, 4 फीट चौड़ा और 2 फीट ऊंचा है।

छाया के लिए प्लास्टिक शेड लगाया गया है। यहां प्रतिवर्ष लगभग 200 से 250 टन वर्मीकम्पोस्ट का उत्पादन किया जा रहा है।खाद निर्माण में मुख्य रूप से आईसीनिया फेटिडा प्रजाति के केंचुओं का उपयोग किया जाता है, जिनकी प्रति बेड लगभग 3 किलोग्राम आवश्यकता होती है।

ये केंचुए तेजी से बढ़ते हैं और तैयार खाद के बाद अन्य बेड में स्थानांतरित किए जा सकते हैं।केंचुआ खाद के प्रमुख लाभ:मिट्टी की उर्वरता में वृद्धिपौधों की वृद्धि में तेजीमिट्टी की संरचना में सुधाररासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता में कमीपर्यावरण के लिए पूर्णतः सुरक्षितकृषि विशेषज्ञों का मानना है कि वर्मीकम्पोस्ट आज के समय में सभी प्रकार की फसलों के लिए वरदान साबित हो रहा है। जो किसान प्राकृतिक खेती और पर्यावरण संतुलन में विश्वास रखते हैं, उन्हें इसे अवश्य अपनाना चाहिए।विश्वविद्यालय द्वारा इच्छुक किसानों एवं युवाओं के लिए 1 सप्ताह का प्रशिक्षण कार्यक्रम भी संचालित किया जाता है, जिससे वे इस तकनीक को सीखकर स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ सकें।
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