“सरकारी दावों की चमक बनाम बारूखोल की सच्चाई: विकास के वादों तले दबा एक गाँव”
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काग़ज़ों पर दर्ज उपलब्धियाँ, घोषणाओं की चमक और मंचों से गूँजते विकास के दावे… सब कुछ सुनने में भले ही आश्वस्त करता हो कि छत्तीसगढ़ निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर है। परंतु यदि इस विकास की असली परख करनी हो तो कदम बढ़ाने होंगे रायगढ़ जिला के वनांचल अंचल, विशेषकर धरमजयगढ़ की ओर—जहाँ सभ्यता और सुविधा के बीच की दूरी आज भी मीलों में नहीं, बल्कि वर्षों में मापी जाती है।

धरमजयगढ़ से अधिक दूर नहीं, ग्राम पंचायत नागदरहा का बारूखोल गाँव एक मौन प्रश्न की तरह खड़ा है—क्या यही वह विकास है जिसका सपना दिखाया गया था? यहाँ तक पहुँचने के लिए कभी कच्ची सड़क भी उपलब्ध नहीं थी। विडंबना देखिए, शासन-प्रशासन की प्रतीक्षा करते-करते थक चुके ग्रामीणों ने स्वयं अपने हाथों से राह बनाई। मिट्टी काटी, पत्थर हटाए, पगडंडी को रास्ते में बदला—तब जाकर गाँव तक आने-जाने की एक साधारण सुविधा संभव हो सकी। यह दृश्य केवल संघर्ष का नहीं, बल्कि व्यवस्था की असफलता का भी साक्ष्य है।

ग्रामीणों की आँखों में उम्मीद की चमक कई बार जगी, जब जनप्रतिनिधि आए, समस्याएँ सुनीं, आश्वासन दिए। परंतु समय बीतता गया और आश्वासन धूल की तरह उड़ते रहे। सरकारें बदलीं, नीतियाँ बदलीं, लेकिन बारूखोल की नियति नहीं बदली। विकास की गाड़ी यहाँ तक आते-आते जैसे थम जाती है।

हाथी प्रभावित क्षेत्र होने के कारण यहाँ जीवन केवल अभाव का नहीं, बल्कि भय का भी पर्याय बन गया है। रात का अंधकार यहाँ सन्नाटे से अधिक दहशत लेकर आता है। खेतों की हरियाली कभी भी उजड़ सकती है, घरों की चौखट पर खतरा दस्तक दे सकता है। वन विभाग की औपचारिक मौजूदगी के बावजूद स्थायी समाधान की प्रतीक्षा आज भी अधूरी है।

गाँव में एक आंगनबाड़ी केंद्र और एक प्राथमिक विद्यालय अवश्य है—पर वह विद्यालय स्वयं शिक्षा की नहीं, उपेक्षा की कहानी कहता है। जर्जर दीवारें, झड़ता प्लास्टर, रिसती छत… मानो हर ईंट अपनी व्यथा बयान कर रही हो। वर्षों से मरम्मत की गुहार लगाई गई, पर कोई सुनवाई नहीं हुई। परिणाम यह कि नन्हें बच्चे एक निजी कच्चे मकान में बैठकर भविष्य गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। शिक्षा का मंदिर खुद सहारे की प्रतीक्षा में खड़ा है—यह दृश्य किसी भी संवेदनशील समाज के लिए प्रश्नचिह्न है।
स्वास्थ्य सुविधा दूर है, सड़क अधूरी है, पेयजल अनिश्चित है और रोजगार के अवसर नगण्य। आपात स्थिति में मरीज को मुख्यालय तक पहुँचाना मानो समय और किस्मत के साथ संघर्ष हो। युवा बेहतर भविष्य की तलाश में पलायन को विवश हैं, और बुज़ुर्ग इस आशा में दिन गिन रहे हैं कि शायद कभी उनके गाँव का नाम भी विकास की सूची में सम्मान से लिया जाएगा।
बारूखोल केवल एक गाँव नहीं, बल्कि उस अंतराल का प्रतीक है जो योजनाओं और यथार्थ के बीच पसरा हुआ है। यह उस मौन पीड़ा का चेहरा है जिसे आँकड़ों और रिपोर्टों में जगह नहीं मिलती। यहाँ के लोग दया नहीं, अधिकार चाहते हैं; सहानुभूति नहीं, सहभागिता चाहते हैं।
यदि विकास वास्तव में समावेशी है, तो उसे शहरों की रोशनी से आगे बढ़कर इन अंधेरे कोनों तक पहुँचना होगा। जब तक बारूखोल जैसे गाँवों की धूल भरी पगडंडियों पर पक्की सड़क नहीं बिछती, जर्जर स्कूल भवन की जगह सुरक्षित कक्षाएँ नहीं बनतीं, और भय के साये की जगह विश्वास नहीं आता—तब तक विकास का हर दावा अधूरा ही रहेगा।
बारूखोल आज भी प्रतीक्षा में है—किसी घोषणा की नहीं, बल्कि उस दिन की, जब विकास केवल शब्द नहीं, बल्कि उसकी धरती पर महसूस की जाने वाली सच्चाई बन जाएगा।
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