February 7, 2026

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पर्यावरण एवं पर्यटन अंक- 44

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पहाड़ों की ट्रैकिंग और प्राकृतिक सौंदर्य का खजाना –

               सिंदूरी चट्टानो का “सिंदरी पहाड़” 

                                     बीरेन्द्र श्रीवास्तव की कलम से। 

      संभाग ब्यूरो दुर्गा गुप्ता

समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और मनमोहक प्राकृतिक वन संपदा के साथ-साथ पहाड़ों, नदियों और वन्य जीवन की विविध जैव विविधता छत्तीसगढ़ की पहचान रही है।  मध्य प्रदेश की अमरकंटक पहाड़ी पर मैकल एवं सतपुड़ा की बिखरी पहाड़ियां  उत्तरी छत्तीसगढ़ के मने.- चिरमिरी -भरतपुर जिले के चांगभखार की पहाड़ियों को पार करते हुए कोरिया जिले के सोनहत क्षेत्र तक फैली हुई है, जो आगे चलती हुई सूरजपुर जिले के कुदरगढ़ पहाड़ तक फैली हुई है।  इन्हीं पहाड़ियों का सौंदर्य अपने अलग-अलग जैव विविधता के संरक्षण के साथ अपना अलग स्थान बनाए हुए हैं।  लुप्त होती प्रजातियों के पक्षी भारतीय गिद्ध एवं दिन में भी शिकार करने वाले उल्लू की विशिष्ट प्रजातियां तथा विदेशी पक्षियों में कोरिया जिले के झील भीमें रेड क्रेस्टेट पोजनार्ड जैसे दुर्लभ प्रजाति के पक्षियों का दक्षिणी यूरोप एवं मध्य एशिया के क्षेत्र से हजारों मील दूर चलकर आना हमारी समृद्ध जैव विविधता को प्रदर्शित करता है।  इसी तरह सघन साल वनों से घिरे पहाड़ों की अपनी अलग-अलग ऐतिहासिक कहानियां है जो यहां के आदिवासी संस्कृति  और जनजीवन के किस्से कहानियों से लेकर गांव की किवदंतियों में भी शामिल हो चुकी है।  छत्तीसगढ़ के अछूते और अनजाने पर्यटन स्थलों का बड़ा भंडार आपको उत्तरी छत्तीसगढ़ में दिखाई पड़ता है। यहां आपको शहरी भीड़ भाड़ के पर्यटन स्थलों से दूर सुखद प्राकृतिक पर्यटन का अनुभव प्राप्त होगा।

                                  यदि आप पहाड़ी ट्रैकिंग और पहाड़ों के सौंदर्य को अपने पर्यटन में शामिल करने के शौकीन हैं तब कोरिया जिले के सोनहत की पहाड़ियों के बीच सिंदूरी रंग की आभायुक्त पत्थरों से रंगी  सिन्दरी पहाड़ आपको बुला रही है। समुद्र सतह से लगभग 860 मीटर (2500 फीट)  ऊंची इस पहाड़ी के चट्टान जब टूट कर पहाड़ की जमीन पर बिखरती है तब लगता है किसी ने जमीन पर सिंदूर बिखेर दिया हो,  यही कारण है कि  इसका नाम सिंदूरी पहाड़ या सिंदरी पहाड़ गांव वालों ने रख दिया।  इस पहाड़ की चढ़ाई पर चढ़ते चढ़ते इसके इतिहास के बारे में कई रोचक जानकारियां हमें रोमांचित करती है। पहाड़  की इस ट्रैकिंग में आज हमारे साथ हमारे गाइड नरपति कुमार नागवंशी तथा इस चंचल के निवासी बलदाऊ राम गोस्वामी कोरिया इतिहास के वार्ताकार योगेश गुप्ता, मनेन्द्रगढ़ केपरयावरण प्रेमी नरेंद्र श्रीवास्तव एवं इस गांव के पूर्व जमीदार के वंशज वीर विक्रम पुरी के साथ यह यात्रा एक यादगार यात्रा बन गई। 

                                     बैकुंठपुर से सोनहत जाने के लिए छत्तीसगढ़ राज्य मार्ग क्रमांक 15 से यात्रा शुरु करते हुए 33 किलोमीटर की दूरी तय करनी होती है यहां पहुंचने के बाद एक गांव “सलगवां कला”  से बाईं और पश्चिम दिशा में आगे भैंसवार जाने के लिए 08 किलोमीटर की यात्रा करनी होगी।  भैंसवार ग्राम पंचायत मुख्यालय तक पहुंचाने के बाद हमें  दाहिनी ओर मुड़कर 1 किलोमीटर दूर जाम टिकरा  गांव पहुंचना होगा।  जाम टिकरा पहुंचने पर  एक उजड़ा हुआ लेकिन पुराने वृक्षों एवं भग्न मंदिरों के अवशेष हमारा रास्ता जिज्ञासा पूर्वक रोक लेते हैं।  बलदाऊ गोस्वामी बताते हैं कि यह बगीचा किसी समय में अपने अंचल की शान हुआ करता था क्योंकि यह गांव पुराने जमीदार स्वर्गीय शिवशरण पुरी का निवास स्थान है।  यहां  उनके भग्न गढ़ी के अवशेष यहां अभी भी विराजमान है। यहां के बगीचे में आम,लीची, गुलजामुन, और झाउ के ऊंचे लंबे पेड़ आसमान से बात करते दिखाई पड़ते हैं।  एक पुराना  शिव मंदिर गांव एवं जमींदार परिवार का आस्था स्थल है जो अपने हृदय में पुरानी रियासतों के अधीन चलने वाली जमींदारी प्रथा के साथ-साथ उनके वंशजों के कई पीढ़ियों की दास्तान समेटे आज भी यहां खड़ा है।  जाम टिकरा के वीर विक्रम पुरी जी ने कहा कि  हमें आगे 3 किलोमीटर बदरा गांव तक चलना होगा क्योंकि इसी बदरा गांव के अंतिम छोर पर स्थित सिंदरी पहाड़ की ऊंचाइयों को नापने का साहस हमें दिखाना होगा।  हमारे साथ बदरा गांव से शामिल हमारे गाइड नरपति नागवंशी ने बताया कि यहां से लगभग 1200 मीटर  की दूरी तय करने के बाद ही हम इस पहाड़ की अंतिम चोटी की ऊंचाई पर पहुंच सकेंगे। 

                               बदरा गांव के अंतिम छोर से धीरे-धीरे सिंदरी पहाड़ की ऊंचाइयों पर चढ़ते हुए हमने यहां के पेड़ पौधों के बारे में कुछ जानकारी लेनी चाहिए तब हमें पता चला कि इस पहाड़ी पर महुलाईन के पेड़ बहुत है। यह अपनी लंबी-लंबी बाहें फैलाए कभी-कभी 100 मीटर तक फैल जाती हैं जो पहाड़ों की ऊंचाइयों से ढलान की ओर कई जगह झूल गई है।  बसंत के मौसम में इसी महुलाइन की लताओं में फूले  हुए फूल इन पहाड़ों की वेणी की सुंदरता बढ़ाने बनाने वाली लताएं साबित करते हैं।  महुलाइन की यही लटे गांव में रस्सी बनाने का मुख्य साधन है।  जो पशुओं को बांधने से लेकर घर की छानी छप्पर में उपयोग की जाती है।  वहीं ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महुलाईन मुख्य भूमिका निभाता है।   पत्तल- दोना  बनाने के लिए ग्रामीण बाजार में इसे बेचा जाता है। कभी-कभी थोक खरीदार के आने पर पूरे गांव को रोजगार मिल जाता है। चढ़ाई के रास्ते पर जगह-जगह टूटे हुए पत्थरों का सिंदूरी रंग बिखरा हुआ अपना अलग सौंदर्य बिखेर रहा था। ऊंचाई  पर पहुंचते हुए हम जैसे-जैसे ऊपर की ओर चल रहे थे  हमें बीच में थोड़ी देर रुक कर पूरी सांस भरने की आवश्यकता महसूस हो रही थी।  नौजवान साथियों की यह परीक्षा की घड़ी थी इसलिए वे आगे बढ़ते गए।  ऊंचाई पर एक समतल स्थान मे पहुंचने के बाद हमने अपने सांसों को स्थिर किया और नीचे फैले हुए गांव का विस्तार देखा कुछ दूरी पर आगे पत्थरों से बने द्वार के भग्नावशेष ने हमें रोमांचित किया। इस स्वागत द्वार के किनारे के कई हिस्से टूट कर बिखर गए थे और इसी से आगे बढ़ती हुई एक गहरी खाई जैसी पत्थरों को काटकर बनाई गई आकृति ने हमें आश्चर्य से भर दिया।  यह और इस स्थल को घेर कर ऐसी बनाई गई थी ताकि कोई भी बाहरी व्यक्ति आसानी से भीतर प्रवेश न कर सके।  हमारी जिज्ञासा को समझते हुए जमींदार  वंशज वीर विक्रम पुरी जी ने बताया कि कहा जाता है कि यह स्थल सैकड़ो वर्ष पहले मराठा लड़ाकों के छिपने का आश्रय स्थल रहा है। यही छिपकर वे अपनी युद्ध की तैयारी करते थे एवं अपनी सैन्य शक्ति एकत्र करने और युद्ध की नई-नई योजनाएं बनाया करते थे।  1897 से 1899 के बीच जब बैकुंठपुर एवं सोनहत  की राजगद्दी खाली थी।  उस समय दो बार मराठा लड़ाकू ने तत्कालीन रनई के गोंड जमीदारों से युद्ध किया था। , क्योंकि उस समय कोरिया रियासत के राजा नहीं होने के कारण यह क्षेत्र उनके जमीदारी का हिस्सा था और उसकी सुरक्षा के लिए जमीदार के सैनिकों ने दो बार मराठा लड़ाको को पराजित कर वापस भेज दिया। ऐसा माना जाता है कि उन्हें मराठा लड़ाकों  का यह निवास और सैनिक स्थल रहा होगा।  जो निर्माण में अधूरा ही रह गया। कभी-कभी प्राकृतिक घटनाओं पर आश्चर्य होता है कि इतनी ऊंचाई पर पीने का पानी कहां मिलता होगा, ऐसी स्थिति में नरपति सिंह हमें पहाड़ के उस ऊंचाई पर ले गए जहां चट्टानों में बने दो छेद से पानी की धार लगातार बह रही थी जो यहां रहने वाले सैनिकों के पानी पीने के काम आती रही होगी।  अभी इस जलधारा की मात्रा कम हो गई है।  प्राकृतिक संपदा के रक्षक आदिवासियों ने अब इस स्थान की चौकसी करने तथा आस्था के लिए अब यहां चैत्र नवरात्रि और बसंत पंचमी को मेला लगाना प्रारंभ कर दिया है जिसमें आसपास के सभी गांव के लोग एकत्र होकर उल्लास आनंद और अपनी प्राकृतिक आस्था का अनुभव प्राप्त करते हैं ।

                           इसी पहाड़ी के पश्चिम में एक  कुलहरिया नाम की नदी बहती है जो दो पहाड़ों की सीमा को निर्धारित करती है इसी में एक और छोटी नदी  कुकरी झरिया  का आकर मिलना इसके प्राकृतिक सौंदर्य को कई गुना बढ़ा देता है।  इन्हीं नदियों की रक्षा करते नदी के दक्षिण दिशा में माचीगढ़  पहाड़ की श्रृंखला मजबूती के साथ खड़ी दिखाई पड़ती है वहीं इसके पूर्व दिशा में उत्तरी छत्तीसगढ़ अंचल का सबसे ऊंचा पहाड़ देवगढ़ पहाड़ की चोटियां फैली हुई है।  इसका विस्तार आगे चांदनी बिहारपुर तक फैला हुआ है जो अब विभाजन के बाद मनेन्द्रगढ़ -चिरमिरी- भरतपुर जिले में आता है। देवगढ़ पहाड़ी के बारे में संत महात्मा कहते हैं कि देवगढ़ पहाड़ की ऊंचाई अपने ऊपर किसी को स्थाई निवास करने की अनुमति नहीं देती यही कारण है कि संतों द्वारा अपनी तपस्थली बनाने के कई प्रयासों के बावजूद कोई भी संत अब तक वहां स्थाई रूप से अपनी तपस्थली नहीं बन सका है। इसी देवगढ़ की पहाड़ी पर आदिमानव के समय काल की कहानी उसके भित्ति चित्र के रूप में गुफाओं में स्थित है जो नई पीढ़ी के शोध छात्रों के लिए मानव के जीवन काल  रहन- सहन और भित्ति चित्र के माध्यम से अपनी भावनाओं  को व्यक्त करने के कई पहलुओं को उजागर करने का जिम्मा सौंपती है। 

                              छोटी-छोटी नदियों को बांधकर मानव द्वारा बनाए गए बांध की समग्र जल राशि की गहराइयों में डुबकी लगाते पक्षियों की कतार भक्त श्रृंखला अनुशासन का हमें पाठ पढ़ती है वही ऊंचाइयों पर पंक्तिबद्ध उड़ते गिद्धों का अपने डैने को झुककर ऊंचाइयों तक पहुंच जाना और उतनी ही तेजी के साथ नीचे आना जैसे दृश्य इस पहाड़ के प्राकृतिक आकर्षण का वह दृश्य है जो आपको जीवन भर याद रहेगा आप अपने कमरे में इन घटनाओं को कैद करने के लिए लालिलित हो जाते हैं क्योंकि सिंदरी पहाड़ की यही अनुभूति आपकी वह पूंजी है जिसे आप अपनी स्मृतियों में हमेशा के लिए यहां से समेट कर ले जाएंगे। 

                               इन्हीं सोनहत की पहाड़ियों में वन्यजीवों की लंबी श्रृंखला को खुले प्रकृति के गलियारे में घूमते देखना एक नए अनुभव से आपको परिचित कराता है तैमूर पिंगला बाघ अभ्यारण का यह क्षेत्र अपने साथ हसदो नदी का उद्गम एवं रास्ते में बंदरों और खरगोश से मुलाकात का एहसास जीवन की वह यादें हैं जो इस भाग दौड़ की जिंदगी में कुछ समय के लिए आपको शांति की ओर ले जाती है और आपको नई ऊर्जा से भर देती है। यही ऊर्जा दुगने उत्साह के साथ आपके काम करने की प्रेरणा बन जाती है। 

                                अब तो हिमालय क्षेत्र में काम करने वाली इंडिया हाइक जैसी कई ट्रैकिंग और इको टूरिज्म के संस्थाएं इस क्षेत्र में अपने पर्यटन टूर की सुविधा दे रही है।  आप इनके माध्यम से भी इस क्षेत्र की खूबसूरती का आनंद ले सकते हैं।  मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले से इस क्षेत्र में आने के लिए सड़क मार्ग उपयुक्त मार्ग है जो राष्ट्रीय राजमार्ग 43 के कटनी – गुमला मार्ग पर स्थित है।  हवाई मार्ग से आप देश के किसी भी कोने से रायपुर, बिलासपुर या अंबिकापुर तक पहुंच सकते हैं जहां से राष्ट्रीय राजमार्ग 43 में पहुंचकर आप कोरिया जिला मुख्यालय बैकुंठपुर पहुंचकर अपना पड़ाव डाल सकते हैं। यहां आपको रुकने के लिए अच्छे होटल एवं भोजन की सुविधा प्राप्त हो सकेगी।  यही से आप सिंदरी पहाड़ की यात्रा के लिए निकल सकेंगे।  यदि आप ज्यादा समय लेकर आए हैं तब ऐसी स्थिति में भित्ति चित्र सहित बालमगढ़ी पहाड़ का प्राकृतिक आनंद भी आप इस यात्रा के दौरान ले सकेंगे। 

  इस बार अपने  मित्रों और परिवार  सहित पर्यटन हेतु निकलने से पहले सिंदरी पहाड़ को शामिल करें।  प्रकृति के शांत हवाओं और वन्यजीवों के संसार से परिचित होने साल वनों के आपसी बातचीत को सुनने तथा पहाड़ों का सौंदर्य निहारने के लिए छत्तीसगढ़ के कोरिया जिला मुख्यालय  बैकुंठपुर पहुंचने की योजना बनाएं। उत्तरी छत्तीसगढ़ का यह अंचल सतपुड़ा के साल वनो की फैली जैव विविधता के बीच पर्वतों की ऊंची नीची श्रृंखलाओं के साथ-साथ भगवान राम के वन गमन के ऐतिहासिक स्मृतियों की कहानियों से भरा पड़ा है ऋषि मुनियों की तपस्थली स्थल की धरोहर भी आपको यहां आने के लिए खुला निमंत्रण दे रही है। यहां का पर्यटन आपको आजीवन नहीं भूलेगा ऐसा हमारा विश्वास है।

बस इतना ही 

फिर मिलेंगे किसी अगले पड़ाव पर 

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