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कोतवाली जांजगीर थाना : कानून का राज या वर्दी की दहशत?

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अपराध नियंत्रण के बजाय कथित मनमानी से चर्चा में थाना

संवाददाता : जिला ब्यूरो चीफ जांजगीर चांपा| उद्घोष समय

जांजगीर-चांपा, 19 जनवरी 2026।
जिला जांजगीर-चांपा का कोतवाली थाना इन दिनों अपराध नियंत्रण के लिए नहीं, बल्कि कथित पुलिस मनमानी और दबाव की कार्यशैली को लेकर चर्चा में है। 31 दिसंबर 2025 को पदभार ग्रहण करने के बाद से ही थाना प्रभारी जय प्रकाश गुप्ता को लेकर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना अब प्रशासन के लिए भी आसान नहीं रह गया है।

स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि कोतवाली थाना अब न्याय का केंद्र न रहकर दबाव और भय का अड्डा बनता जा रहा है। जब चाहे किसी को थाने बुला लेना, मनमानी पूछताछ करना और बात न मानने पर कठोर कानूनी धाराओं की धमकी देना — ये आरोप बेहद गंभीर हैं।

गरीब, कमजोर और निस्सहाय बने आसान निशाना

आरोपों के अनुसार सबसे अधिक निशाने पर वे लोग हैं जिनके पास न तो पैसा है, न पहुंच और न ही कोई सिफारिश। स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसे व्यक्तियों को अपराधी साबित करना सबसे आसान रास्ता बन गया है। यह स्थिति कानून के समान उपयोग के सिद्धांत पर सीधा प्रश्नचिह्न लगाती है।

महिलाओं और बच्चों को लेकर भी गंभीर आरोप

खबर के अनुसार कथित कार्रवाइयों में महिलाओं और नाबालिग बच्चों को भी आरोपी बनाए जाने के आरोप सामने आए हैं। यदि ये आरोप सत्य हैं तो यह केवल पुलिस मैनुअल का ही नहीं, बल्कि मानवाधिकारों का भी गंभीर उल्लंघन माना जाएगा।

क्या आंकड़ों के दबाव में कुचला जा रहा न्याय?

सूत्रों का दावा है कि अपनी कार्यकुशलता दिखाने और आंकड़े चमकाने के लिए मामलों में अनावश्यक रूप से कठोर धाराएं जोड़ी जा रही हैं। यदि पुलिस स्वयं की पीठ थपथपाने के लिए कानून का सहारा लेने लगे, तो यह न्याय व्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।

अब निगाहें पुलिस अधीक्षक पर

यह मामला अब थाना स्तर से ऊपर उठ चुका है। जिला पुलिस अधीक्षक जांजगीर-चांपा के लिए यह केवल एक अधिकारी पर लगे आरोपों की जांच नहीं, बल्कि पूरे कोतवाली जांजगीर थाने की कार्यप्रणाली और विश्वसनीयता की परीक्षा है।
यदि आरोप निराधार हैं तो पारदर्शी जांच से सच्चाई सामने आनी चाहिए, और यदि आरोपों में सच्चाई है तो तत्काल प्रभाव से निष्पक्ष कार्रवाई ही जनता का विश्वास बहाल कर सकती है।

खामोशी भी अपराध होती है

प्रशासन की अब तक की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता ने गलत को अनदेखा किया है, तब-तब जनता का भरोसा टूटा है। यह समय फाइलें दबाने का नहीं, बल्कि सच्चाई सामने लाने का है।

अब सवाल यह है कि—
क्या जांजगीर की कोतवाली में कानून का राज है या वर्दी का?
और क्या प्रशासन न्याय के साथ खड़ा होगा या खामोशी के साथ?

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