कोतमा के 8 गांवों में भूमि अधिग्रहण का विरोध तेज, जन सुनवाई की वैधता पर सवाल ।।।
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कोतमा क्षेत्र में प्रस्तावित मेसर्स अनूपपुर थर्मल एनर्जी (एम.पी.) प्राइवेट लिमिटेड की ताप विद्युत परियोजना के लिए रेलवे कॉरिडोर निर्माण हेतु शुरू की गई भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया अब बड़े विवाद का रूप ले चुकी है। परियोजना के अंतर्गत कोतमा तहसील के 8 गांवों की उपजाऊ कृषि भूमि अधिग्रहित किए जाने के प्रस्ताव ने ग्रामीणों में गहरी नाराजगी और असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है।
जिला प्रशासन द्वारा 16 जनवरी 2026 को शासकीय हाई स्कूल बैहाटोला में प्रस्तावित जन सुनवाई को लेकर गंभीर आपत्तियां सामने आई हैं। सामाजिक कार्यकर्ता रामजी रिंकू मिश्रा ने कलेक्टर अनूपपुर को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि जन सुनवाई की पूरी प्रक्रिया कानून की मंशा के विपरीत और एकपक्षीय है।
कानून के उल्लंघन का आरोप ::::
पत्र में स्पष्ट कहा गया है कि भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम 2013 तथा मध्यप्रदेश भूमि अधिग्रहण नियम 2015 का उल्लंघन करती है। नियमों के अनुसार, प्रत्येक प्रभावित ग्राम सभा में अलग-अलग जन सुनवाई कराना अनिवार्य है, जबकि प्रशासन द्वारा सभी गांवों को एक ही स्थान और एक ही तिथि पर बुलाना ग्रामीणों के संवैधानिक अधिकारों का हनन बताया गया है।
पेसा एक्ट की अनदेखी का आरोप ::::
ग्रामीणों का कहना है कि कोतमा तहसील का बड़ा हिस्सा अनुसूचित क्षेत्र में आता है, जहां पेसा एक्ट के तहत ग्राम सभा की पूर्व सहमति अनिवार्य है। इसके बावजूद अब तक न तो ग्राम सभाओं की सहमति ली गई और न ही किसानों को मुआवजा, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन की स्पष्ट जानकारी दी गई है।
किसानों में बढ़ती आशंका ::::
किसानों का आरोप है कि रेलवे कॉरिडोर के नाम पर उनकी पुश्तैनी और उपजाऊ जमीनें छीनी जा रही हैं, जिससे उनकी आजीविका पर सीधा संकट खड़ा हो गया है। ग्रामीणों का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास के नाम पर विस्थापन और अन्याय स्वीकार नहीं किया जाएगा।
स्थानीय सवाल ::::
क्षेत्र में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि
“विकास की इस पटरी पर आखिर कौन सवार होगा और किसका संसार उजड़ जाएगा?”
ग्रामीणों की मांग ::::
ग्रामीणों ने एक स्वर में मांग की है कि परियोजना से प्रभावित सभी गांवों में अलग-अलग ग्राम सभाओं के माध्यम से पारदर्शी जन सुनवाई कराई जाए, ताकि किसानों की बात सीधे सुनी जा सके।
अब क्षेत्र की निगाहें 16 जनवरी को प्रस्तावित जन सुनवाई और इस पर जिला प्रशासन द्वारा लिए जाने वाले निर्णय पर टिकी हुई हैं।
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