एकेएस विश्वविद्यालय के दो शोधकर्ताओं की अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि
सीआरसी प्रेस में प्रकाशित हुआ महत्वपूर्ण शोध अध्याय
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सतना। एकेएस विश्वविद्यालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग की शोध–उपलब्धियों में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ते हुए विभागाध्यक्ष डॉ. अश्विनी ए. वाऊ और सहायक प्राध्यापक डॉ. कीर्ति समदरिया का शोध–कार्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित सीआरसी प्रेस–टेलर एंड फ्रांसिस समूह की पुस्तक में प्रकाशित हुआ है। “कृषि अपशिष्ट का उपयोग कर उच्च–मूल्य रसायनों का उत्पादन” विषयक यह अध्याय वर्ष 2025 में प्रकाशित पुस्तक “परिपत्र अर्थव्यवस्था के लिए जैव–द्रव्य आधारित हरित प्रौद्योगिकी” में शामिल किया गया है। पुस्तक का ऑनलाइन आईएसबीएन 9781003500469 इसकी वैश्विक महत्ता को रेखांकित करता है।
सीआरसी प्रेस वैज्ञानिक प्रकाशन जगत में विश्वसनीयता और गहन शोध का पर्याय माना जाता है। ऐसे प्रतिष्ठित मंच पर इस अध्याय का स्थान पाना न केवल दोनों शोधकर्ताओं की वैज्ञानिक दृष्टि और शोध–गंभीरता का प्रमाण है, बल्कि एकेएस विश्वविद्यालय की शैक्षणिक पहचान को भी अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में और अधिक सुदृढ़ करता है। यह उपलब्धि सतत कृषि, हरित प्रौद्योगिकी तथा परिपत्र जैव–अर्थव्यवस्था की दिशा में विश्वविद्यालय के योगदान को नई ऊर्जा प्रदान करती है।
अध्याय में कृषि–अपशिष्ट को उच्च–मूल्य रसायनों में बदलने की नवीनतम वैज्ञानिक प्रक्रियाओं पर व्यापक विवेचन प्रस्तुत किया गया है। अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि खेतों में बचने वाला जैव–अपशिष्ट उन्नत तकनीकों के माध्यम से मूल्यवान रासायनिक उत्पादों में परिवर्तित किया जा सकता है। यह शोध कार्बन तटस्थता, अपशिष्ट मूल्यवर्धन और पर्यावरण–अनुकूल कृषि–प्रणालियों से जुड़े वैश्विक मुद्दों को वैज्ञानिक समाधान के साथ सामने रखता है। साथ ही कृषि–अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़े पर्यावरणीय संकटों और चुनौतियों पर भी सुचिंतित दृष्टिकोण प्रदान करता है।
यह कार्य बायोमास अपशिष्ट को जैव–ईंधन तथा उच्च–कोटि के रसायनों के उत्पादन हेतु उपयोगी कच्चे पदार्थ के रूप में देखने की नई संभावनाएँ खोलता है। पुस्तक का उद्देश्य शोधार्थियों और उद्योग जगत के विशेषज्ञों को जैव प्रौद्योगिकी और परिपत्र अर्थव्यवस्था के अत्याधुनिक वैज्ञानिक आयामों से परिचित कराना है।
इस अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि पर जीवन विज्ञान संकाय के डीन डॉ. कमलेश चौरे ने डॉ. अश्विनी वाऊ और डॉ. कीर्ति समदरिया को शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि यह उपलब्धि विश्वविद्यालय की शोध–परंपरा को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाती है और भावी शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी।
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