कीचड़ में दबी ज़िन्दगी — धरमजयगढ़ के आदिवासी गाँवों में विकास के दावों की पोल
धरमजयगढ़
बारिश थम चुकी है, लेकिन दलदल अब भी गाँव को जकड़े हुए है!कड़राजा से पंडरा पाट जाने वाला रास्ता नाम भले ही सडक हो लेकिन हालत ऐसे है कि पैर उठाना भी मुश्किल है!इसी टूटे -फूटे कीचड़ से भरे रास्ते पर ग्राम पंचायत विजयनगर के कड़राजा मोहल्ला पटना पाट में एक पति अपनी बीमार पत्नी को गोद में उठाये अस्पताल कि ओर बढ़ रहा था!

मरीज तुलसी बाई राठिया और उनके पति लक्ष्मण राम राठिया मज़बूरी इतनी कि बारिश और कीचड़ से जूझते हुए पत्नी को पैदल कई किलोमीटर दूर कापू के अस्पताल तक ले जाना पड़ा! यह कोई फ़िल्म दृश्य नहीं, बल्कि रायगढ़ जिले के दूर आदिवासी अंचल की जमीनी सच्चाई है, जहाँ लोग आज भी पाषाण युग में कठिन जिंदगी जीने को मजबूर है!
विकास की वादे हकीकत में दलदल —
यह सिर्फ एक परिवार कि परेशानी नहीं, बल्कि उन हज़ारों ग्रामीणों कि रोज़मर्रा की लड़ाई है, जो हर साल बरसात में ऐसे ही हालत झेलते है! यहाँ न पक्की सड़क है, न एम्बुलेंस की सुविधा, न ही स्वास्थ्य केंद्र तक पहुँचने का आसान रास्ता!किसी के बीमार पड़ते ही उसे खटिया, साइकिल या गोद में उठाकार दलदल और गड़ढों से भरे रास्तों पर कई किलोमीटर ले जाना पड़ता है!

भाषणों में कहा जाता है – “आदिवासी इलाकों में विकास की गंगा बह रही है, अंतिम व्यक्ति तक सुविधा पहुंचना हमारी प्राथमिकता है “- लेकिन कड़राजा मोहल्ला पंडरा पाट और ऐसे सैकड़ो गाँवों में यह गंगा कहीं नहीं बहती!यहाँ बहता है तो बस कीचड़, और पसरी रहती है सरकारी लापरवाही की बदबू!
बरसात आते हीं सड़के दलदल में बदल जाती है, अस्पताल तक पहुंचना जान जोखिम में डालने जैसा हो जाता है, और “विकास ” का सपना बस पोस्टरों और भाषणों में क़ैद रह जाता है!

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