भारत निर्णायक मोड़ पर: सरकार, समाज और नागरिक—कौन निभा रहा है अपनी जिम्मेदारी?
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भारत आज जिस दौर से गुजर रहा है, वह केवल उपलब्धियों का उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन और जवाबदेही तय करने का समय है। विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने का दावा करने वाला देश आज बेरोजगारी, महंगाई, असमानता, पर्यावरण संकट और सामाजिक असंतोष जैसी गंभीर चुनौतियों से घिरा है। प्रश्न केवल समस्याओं का नहीं, बल्कि यह है कि सरकार, समाज और नागरिक—तीनों अपनी-अपनी भूमिका कितनी ईमानदारी से निभा रहे हैं?
बेरोजगारी: नीतियों की सफलता पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न
युवा भारत आज नौकरी नहीं, जवाब मांग रहा है। डिग्रियाँ हाथ में हैं, लेकिन अवसर हाथ से फिसलते जा रहे हैं। सरकारी भर्तियाँ धीमी हैं और निजी क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ी है। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, सामाजिक संकट का संकेत है।
सरकार की भूमिका: नीतियाँ कागज़ पर नहीं, ज़मीन पर दिखनी चाहिए। कौशल विकास को औपचारिकता से बाहर निकालकर उद्योगों से जोड़ना होगा।
समाज की भूमिका: योग्यता के बजाय सिफारिश और दिखावे की संस्कृति पर रोक लगानी होगी।
नागरिक की भूमिका: केवल सरकारी नौकरी की मानसिकता से बाहर निकलकर कौशल और उद्यमिता को अपनाना होगा।
गरीबी और असमानता: विकास किसके लिए?
एक ओर मॉल और मेट्रो हैं, दूसरी ओर भूख और बेरोजगारी। यह विरोधाभास बताता है कि विकास की धारा समान नहीं बह रही। यदि असमानता यूँ ही बढ़ती रही, तो सामाजिक ताना-बाना कमजोर होना तय है।
सरकार: कल्याणकारी योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करे।
समाज: संवेदनशीलता और सहयोग की भावना विकसित करे।
नागरिक: केवल लाभार्थी नहीं, जिम्मेदार सहभागी बने।
शिक्षा और स्वास्थ्य: भविष्य की अनदेखी
शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च को आज भी बोझ समझा जाता है, जबकि यही राष्ट्र निर्माण की नींव हैं। बिना गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सुलभ स्वास्थ्य के आत्मनिर्भर भारत केवल नारा बनकर रह जाएगा।
भ्रष्टाचार: सिस्टम की सबसे बड़ी बीमारी
भ्रष्टाचार ने विकास की गति को ही नहीं, भरोसे को भी नुकसान पहुँचाया है। जब ईमानदारी अपवाद बन जाए, तो व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
समाधान: डिजिटल व्यवस्था, सख्त कानून और नागरिक निगरानी—तीनों एक साथ जरूरी हैं।
भविष्य की चेतावनी: अब भी नहीं चेते तो देर हो जाएगी
जनसंख्या विस्फोट, जल संकट, प्रदूषण और अनियंत्रित शहरीकरण आने वाली पीढ़ियों के लिए खतरे की घंटी हैं। ये समस्याएँ भविष्य की नहीं, वर्तमान की सच्चाई बन चुकी हैं।
निष्कर्ष: जिम्मेदारी तय किए बिना समाधान संभव नहीं
भारत को मजबूत बनाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। समाज को दिशा देनी होगी और नागरिक को जिम्मेदार बनना होगा।
जब सरकार जवाबदेह, समाज संवेदनशील और नागरिक सजग होगा—तभी भारत सच में सशक्त बनेगा।
अब समय भाषणों का नहीं, निर्णयों और क्रियान्वयन का है।
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