धरमजयगढ़ में काग़ज़ी हरियाली का खेल? वृक्षारोपण के नाम पर लाखों खर्च, ज़मीनी सच्चाई संदिग्ध !
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धरमजयगढ़ वन मंडल के बकरुमा रेंज अंतर्गत जमाबीरा और सिसरिंगा क्षेत्र में वन विकास और पर्यावरण संरक्षण के नाम पर वर्षों से बड़े पैमाने पर खर्च किए जाने का दावा किया जा रहा है। सरकारी पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि इन क्षेत्रों में एएनआर (प्राकृतिक पुनर्जनन) और क्षतिपूरक वृक्षारोपण के तहत लाखों रुपये के कार्य स्वीकृत और भुगतान किए गए, लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों से मेल नहीं खाती।
जमाबीरा क्षेत्र में वर्ष 2013 से 2017 के बीच 78.32 हेक्टेयर क्षेत्र में एएनआर कार्य दर्शाया गया है। रिकॉर्ड के अनुसार एक ही क्षेत्र में अलग-अलग वर्षों में चरणबद्ध तरीके से कार्य स्वीकृत किए गए और हर वर्ष लाखों रुपये खर्च दिखाए गए। सवाल यह है कि यदि यह क्षेत्र पहले से प्राकृतिक वन था, तो लगातार पांच वर्षों तक वहां किस प्रकार का कार्य किया गया और उसका प्रत्यक्ष परिणाम आज कहां दिखाई देता है। मौके पर न तो एएनआर से जुड़े कोई स्पष्ट संकेत नजर आते हैं, न ही संरक्षण, सुधार या घेराबंदी जैसे कार्यों के ठोस प्रमाण।

इसी तरह सिसरिंगा क्षेत्र में 23.552 हेक्टेयर में क्षतिपूरक वृक्षारोपण के लिए राजकोट एएआर साइट में लगभग लाखों रुपये की राशि स्वीकृत होना दर्शाया गया है। यह कार्य दस वर्षों की अवधि का बताया गया है, जिसमें पौधारोपण, देखरेख, निरीक्षण और प्रगति रिपोर्ट शामिल है। इसके बावजूद क्षेत्र में पौधों की वास्तविक संख्या, उनकी जीवितता और संरक्षण की स्थिति को लेकर गंभीर संदेह बना हुआ है। यदि कार्य वास्तव में ज़मीन पर हुआ होता, तो उसका प्रभाव आज स्पष्ट रूप से दिखाई देना चाहिए था।
इन दोनों मामलों में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या निरीक्षण और सत्यापन केवल काग़ज़ों और ऑनलाइन पोर्टल तक ही सीमित रहे। क्या एक ही क्षेत्र को अलग-अलग वर्षों में दिखाकर बार-बार भुगतान लिया गया। क्या पर्यावरण संरक्षण के नाम पर सार्वजनिक धन का सही उपयोग हुआ या फिर फाइलों में हरियाली दिखाने का खेल चलता रहा।
चिंताजनक तथ्य यह भी है कि संबंधित स्थल पर लगे साइन बोर्ड में कार्य वर्ष 2024-25 दर्शाया गया है, जबकि रिकॉर्ड के अनुसार पूर्व वर्षों में 78.32 हेक्टेयर में एएनआर कार्य होना बताया गया है, जिसका कोई ठोस प्रमाण धरातल पर नजर नहीं आता।
वन संरक्षण जैसे संवेदनशील विषय में इस तरह की अनियमितताएं न केवल विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती हैं, बल्कि सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता और मंशा पर भी संदेह पैदा करती हैं। यदि समय रहते स्वतंत्र भौतिक सत्यापन, जियो-टैगिंग और जिम्मेदारी तय नहीं की गई, तो धरमजयगढ़ के जंगलों में हरियाली सिर्फ काग़ज़ों और पोर्टलों तक सीमित रह जाएगी, ज़मीन पर उसका अस्तित्व नाम मात्र का रह जाएगा।
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