एम्बुलेंस के इंतजार में बुझ गई पत्रकार की जिंदगी ? शेख आलम की मौत ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर लगाया सवालिया निशान ! पत्रकार शेख आलम की असामयिक मौत से नाराजगी ; समय पर मिलती एम्बुलेंस तो बच सकती थी जान ?
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धरमजयगढ़ – मंगलवार को पत्रकार शेख आलम की असामयिक मौत के बाद धरमजयगढ़ सिविल अस्पताल की आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। परिजनों और नागरिकों में कथित तौर पर एम्बुलेंस समय पर उपलब्ध नहीं होने तथा चिकित्सा प्रक्रिया में हुई देरी को लेकर आक्रोश है।

बताया जा रहा है कि गंभीर स्थिति में पत्रकार शेख आलम को उच्च स्तरीय उपचार के लिए रेफर किया गया, लेकिन एम्बुलेंस सेवा उपलब्ध होने में करीब दो घंटे का समय लग गया। इसके बाद उन्हें धरमजयगढ़ से रायगढ़ रेफर किया गया, जहां अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनकी हालत बेहद गंभीर हो गई और चिकित्सकों ने अस्पताल पहुंचने पर उन्हें मृत घोषित कर दिया।

परिजनों और स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि गंभीर अवस्था में समय पर एम्बुलेंस उपलब्ध हो जाती और मरीज को तत्काल उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधा मिल पाती, तो संभवतः उपचार का बेहतर अवसर मिल सकता था।

इस घटना ने धरमजयगढ़ की आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंता जरूर पैदा कर दी है। गंभीर मरीज के लिए एक-एक मिनट महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में एम्बुलेंस उपलब्ध होने में लंबी देरी और उसके बाद उच्च स्तरीय उपचार तक पहुंचने में लगने वाला समय कितना निर्णायक हो सकता है, यह घटना उसकी गंभीरता को सामने लाती है।
मीडिया में सक्रियता, जमीनी हकीकत में खामोशी?
अस्पताल में चिकित्सा सुविधाओं को बेहतर बनाने के उद्देश्य से गठित जीवनदीप समिति की भूमिका भी चर्चा में है। समिति की ओर से अस्पताल के विकास और चिकित्सा सुविधाओं में सुधार को लेकर समय-समय पर सक्रियता और प्रयासों की बातें सामने आती रही हैं। लेकिन जब अस्पताल की व्यवस्था को लेकर गंभीर घटनाएं सामने आती हैं, तब समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों की ओर से सार्वजनिक रूप से ठोस हस्तक्षेप अथवा जवाबदेही की मांग दिखाई नहीं देती।
आखिर जीवनदीप समिति की सक्रियता केवल बैठकों और मीडिया तक है या अस्पताल की वास्तविक व्यवस्था सुधारने तक भी?
यदि समिति अस्पताल की व्यवस्था सुधारने के लिए गठित है, तो उसे यह भी देखना होगा कि आपातकालीन स्थिति में मरीज को किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ रहा है। केवल सुविधाओं की उपलब्धता का दावा पर्याप्त नहीं, उनका जरूरत के समय प्रभावी रूप से उपलब्ध होना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
सबसे बड़ा मुद्दा अब केवल एक मरीज के साथ हुई कथित देरी तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि धरमजयगढ़ सिविल अस्पताल में यदि अचानक कोई गंभीर मरीज पहुंचता है, तो क्या उसे तत्काल एम्बुलेंस और आवश्यक आपातकालीन चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने की व्यवस्था वास्तव में तैयार है?
पत्रकार शेख आलम की मौत ने इसी व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर फिर से ध्यान खींचा है। यदि एम्बुलेंस उपलब्ध कराने में लगभग दो घंटे लगते हैं, तो आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था की तैयारियों की समीक्षा आवश्यक हो जाती है।
प्रभारी बदलते रहे, व्यवस्थाओं में बदलाव की उम्मीद बनी रही, लेकिन मंगलवार की घटना ने एक बार फिर बता दिया कि कागजों और दावों से अलग जमीन पर आपातकालीन व्यवस्था कितनी सक्षम है, इसे परखा जाना जरूरी है।
अब जरूरत आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय करने की है। एम्बुलेंस के लिए सूचना कब दी गई, वाहन उपलब्ध क्यों नहीं था, कितने समय बाद एम्बुलेंस पहुंची, रेफरल के बाद मरीज को किस समय रवाना किया गया और रास्ते में तथा गंतव्य अस्पताल में उपचार की क्या व्यवस्था रही—इन सभी बिंदुओं की जांच ही यह स्पष्ट कर सकती है कि इस दुखद घटना में कहीं उपचार में हुई देरी ने स्थिति को और गंभीर तो नहीं बनाया।
एक पत्रकार की असामयिक मौत ने धरमजयगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने फिर वही सवाल खड़ा कर दिया है—गंभीर मरीज के लिए एम्बुलेंस और उपचार समय पर नहीं मिला, तो आखिर इस व्यवस्था की जवाबदेही किसकी है?

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