पर्यावरणीय मंजूरी अधर में ?, मांड नदी पर माफियाओं का राज ? वैध खनन ठप, अवैध उत्खनन बेलगाम
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धरमजयगढ़/रायगढ़। रायगढ़ जिले में रेत खनन व्यवस्था पूरी तरह सवालों के घेरे में है। एक ओर प्रशासन पर्यावरणीय स्वीकृति लंबित होने का हवाला देकर 15 नीलाम रेत खदानों का संचालन शुरू नहीं करा पा रहा, वहीं दूसरी ओर मांड नदी सहित विभिन्न नदी तटों से रेत का अवैध उत्खनन बेखौफ़ जारी होने की चर्चाएँ क्षेत्रभर में तेज हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब वैध खदानें बंद हैं तो बाजार तक पहुँच रही रेत आखिर आ कहाँ से रही है?
जानकारी के अनुसार जिले में वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए रेत खदान नीलामी से 9 लाख रुपये राजस्व प्राप्ति का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन अब तक मात्र 4.51 लाख रुपये ही प्राप्त हो सके हैं। इसी प्रकार रॉयल्टी मद में 10 लाख रुपये के लक्ष्य के विरुद्ध केवल 4.90 लाख रुपये की वसूली दर्ज की गई है। आंकड़े स्वयं बता रहे हैं कि वैध खनन ठप रहने से शासन को राजस्व का भारी नुकसान हो रहा है।
जिले की 15 रेत खदानों की नीलामी अक्टूबर-नवंबर में ही पूर्ण हो चुकी थी। बोलिदारों द्वारा माइनिंग प्लान और पर्यावरणीय स्वीकृति हेतु आवेदन भी किए जा चुके हैं, लेकिन महीनों बाद भी एक भी खदान का वैध रुप से शुरू न होना प्रशासनिक लचीलापन और विभागीय समन्वयहीनता की ओर इशारा करता है।
*माण्ड नदी का सीना छलनी, निगरानी तंत्र मौन*
क्षेत्रीय सूत्रों का दावा है कि धरमजयगढ़ क्षेत्र की जीवनदायिनी मांड नदी से बड़े पैमाने पर अवैध उत्खनन जारी है।
विशेष रूप से दुर्गापुर और आमादरहा क्षेत्र में नदी तटों से धड़ल्ले से रेत निकासी की चर्चाएँ आम हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि रेत माफिया दिनदहाड़े नदी का सीना छलनी कर रहे हैं, जबकि जिम्मेदार विभागों की कार्रवाई नगण्य दिखाई दे रही है।
दोहरी मार: नदी भी बर्बाद , राजस्व की भी हानि –
विशेषज्ञों का कहना है कि अनियंत्रित और अवैज्ञानिक रेत उत्खनन से नदी की धारा बदलने, जलस्तर गिरने, तट कटाव बढ़ने और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी गंभीर स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। दूसरी ओर शासन को वैध खनन बंद रहने से राजस्व हानि अलग झेलनी पड़ रही है।
प्रश्नों के घेरे में तंत्र –
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या पर्यावरणीय मंजूरी की धीमी प्रक्रिया ने अवैध कारोबारियों को खुला मैदान दे दिया है ?
क्या निगरानी तंत्र की निष्क्रियता अवैध उत्खनन को संरक्षण दे रही है ?
प्रशासन के लिए यह समय केवल कागजी प्रक्रिया आगे बढ़ाने का नहीं, बल्कि लंबित स्वीकृतियों का त्वरित निराकरण और अवैध उत्खनन पर कठोर कार्रवाई का है, अन्यथा राजस्व और पर्यावरण दोनों की क्षति बढ़ती जाएगी।
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