ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती से बढ़ेगी किसानों की आय – डॉ. डी.पी. चतुर्वेदी, ए के एस यूनिवर्सिटी।
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सतना, मध्य प्रदेश।डॉ. डी.पी. चतुर्वेदी, विभागाध्यक्ष (एग्रोनॉमी), ए.के.एस. यूनिवर्सिटी ने किसानों को ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती अपनाने की सलाह दी है। उन्होंने बताया कि यह फसल कम समय, कम लागत और कम पानी में अधिक लाभ देने वाली है।
डॉ. चतुर्वेदी के अनुसार, मूंग दाल न केवल पोषण का महत्वपूर्ण स्रोत है, बल्कि यह मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में भी सहायक है। यह फसल नाइट्रोजन स्थिरीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से भूमि में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाती है, जिससे अगली फसलों को भी लाभ मिलता है।उन्होंने बताया कि रबी फसल के बाद खाली खेतों में मार्च-अप्रैल के दौरान मूंग की बुवाई कर किसान अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते हैं। उन्नत किस्मों जैसे PDM-139, SML-668 और HUM-16 का चयन करने से उत्पादन में वृद्धि होती है।खेती की तकनीक बताते हुए उन्होंने कहा कि 15–20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज दर पर्याप्त होती है तथा बीजों को राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना चाहिए। कतारों के बीच 30 सेमी और पौधों के बीच 10 सेमी दूरी रखना उपयुक्त है।सिंचाई प्रबंधन पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि 3–4 बार सिंचाई पर्याप्त होती है, विशेष रूप से फूल आने और दाना भरने की अवस्था में पानी देना जरूरी है। साथ ही, समय-समय पर निराई-गुड़ाई और कीट नियंत्रण से अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है।डॉ. चतुर्वेदी ने बताया कि ग्रीष्मकालीन मूंग लगभग 60–70 दिनों में तैयार हो जाती है और औसतन 8–12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन देती है। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे इस फसल को अपनाकर अपनी आय में वृद्धि करें और मिट्टी की सेहत को भी सुधारें।
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