जनकल्याण या बंदरबांट? मृत हितग्राही के नाम पर महीनों राशन उठाने का खुलासा”
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धरमजयगढ़ – छत्तीसगढ़ सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का मूल उद्देश्य गरीब, मजदूर और किसानों तक निःशुल्क राशन—चावल, चना और नमक—सुनिश्चित रूप से पहुँचाना है। कागज़ों में इन योजनाओं की तस्वीर अत्यंत सुदृढ़ और प्रभावशाली दिखाई देती है, किंतु ज़मीनी हकीकत कई असहज प्रश्न खड़े करती है। एक ओर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार पात्र हितग्राहियों तक योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक तंत्र का एक हिस्सा इन्हीं योजनाओं में अनियमितताओं के आरोपों से घिरा नज़र आता है। प्रश्न यह है—क्या यह महज़ लापरवाही है या फिर किसी सुनियोजित मिलीभगत का परिणाम?
मामला धरमजयगढ़ विकासखंड का है, जहाँ कई पात्र हितग्राही ई-पॉस मशीन पर अंगूठा सत्यापन के बाद भी राशन से वंचित रह जाते हैं। आश्चर्यजनक तथ्य यह सामने आया कि एक ऐसे हितग्राही के नाम पर, जिसकी मृत्यु 10 जुलाई 2021 को हो चुकी है, जनवरी 2024 से दिसंबर 2025 तक लगभग 20–22 माह तक नियमित रूप से राशन वितरण दर्शाया गया। यह स्थिति न केवल व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि यह भी सोचने पर विवश करती है कि आखिर ई-पॉस मशीन पर सत्यापन किस प्रकार किया गया? क्या यह तकनीकी खामी है या मानवीय हेरफेर?
अनियमितताओं का दायरा यहीं तक सीमित नहीं है। जहाँ वास्तविक जरूरतमंद व्यक्ति राशन कार्ड के लिए पंचायत से जनपद तक महीनों चक्कर लगाता है, वहीं कुछ उचित मूल्य दुकानों में एक ही व्यक्ति के नाम से दो अलग-अलग स्थानों पर राशन कार्ड जारी होने और दोनों पर वितरण दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। यदि वास्तविक हितग्राही अनभिज्ञ है, तो सत्यापन की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठना स्वाभाविक है।
शिकायतों के उपरांत खाद्य विभाग ने इसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली आदेश-2016 की कंडिका 5(1) एवं 15 का उल्लंघन तथा आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 3/7 के अंतर्गत दंडनीय बताया है। संबंधित राशन कार्ड निरस्त करने और प्रतिवेदन भेजने की प्रक्रिया प्रारंभ किए जाने की बात कही गई है। तथापि मूल प्रश्न अब भी अनुत्तरित है—क्या विभाग को कार्रवाई के लिए शिकायत की प्रतीक्षा करनी चाहिए थी? निगरानी तंत्र की सक्रियता कहाँ थी?
कटु सत्य यही है कि योजनाएँ जिनके लिए बनाई जाती हैं, यदि वही उनसे वंचित रह जाएँ तो घोषणाओं का कोई औचित्य नहीं रह जाता। जनकल्याण का वास्तविक मापदंड कागज़ी उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि पारदर्शी और जवाबदेह क्रियान्वयन है। जब तक दोषियों पर त्वरित, निष्पक्ष और सार्वजनिक कार्रवाई सुनिश्चित नहीं की जाती, तब तक “जनकल्याण” केवल एक नारा बनकर रह जाएगा—और भूखा हितग्राही व्यवस्था से न्याय की प्रतीक्षा करता रहेगा।
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