जब पहाड़ की खामोशी ने एक मासूम की सिसकी सुनी…
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भरहुत पहाड़ के पास लावारिस पड़ा वह नवजात कोई “खबर” नहीं था—
वह हमारे समाज का आईना था।
न बोल पाने वाला, नामहीन, पहचान से परे…
जिसने दुनिया में आँख खोली ही थी कि उसे दुनिया ने ठुकरा दिया।
ठंडे पत्थरों के बीच पड़ा वह नन्हा शरीर मानो पूछ रहा था—
“क्या यही इंसानियत है?”
ऊँचेहरा थाना क्षेत्र में मिला यह नवजात उस व्यवस्था पर सवाल है,
जो गर्भ से पहले योजनाएँ बनाती है
लेकिन जन्म के बाद ज़िम्मेदारी भूल जाती है।
उस पल अगर इंसानियत पूरी तरह मरी नहीं,
तो वजह बने ऊँचेहरा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टर और स्टाफ।
गंभीर हालत में पहुँचे उस मासूम को
सीबीएमओ डॉ. ए.के. राय के नेतृत्व में
डॉ. विनीत गुप्ता, डॉ. (श्रीमती) अनामिका राय, डॉ. श्रुति अग्रवाल,
स्टाफ नर्स अनिता तोमर, एएनएम और बीपीएम संजीव ताम्रकार
ने सिर्फ इलाज नहीं दिया—
उन्होंने उसे ज़िंदगी दी।
जब दवाइयों से आगे बात पहुँची,
तब अस्पताल में भर्ती प्रसूता माताओं ने
खून का रिश्ता नहीं, ममता का रिश्ता निभाया।
अपनी सहमति से वेट फीडिंग कराई—
क्योंकि माँ होना सिर्फ जन्म देना नहीं,
बचाना भी होता है।
उस पल यह साफ़ हो गया—
इंसानियत कानूनों से नहीं,
दिलों से चलती है।
हालत स्थिर होने पर
108 एंबुलेंस से नर्सिंग स्टाफ के साथ
नवजात को जिला अस्पताल सतना भेजा गया।
एक जीवन, जो पहाड़ों में छूट सकता था,
आज इलाज की रोशनी में है।
लेकिन सवाल अब भी ज़िंदा हैं—
🕯️ कौन है वो, जिसने इस मासूम को छोड़ दिया?
🕯️ कब तक बेटियाँ और बेटे यूँ सड़कों पर मिलते रहेंगे?
🕯️ और क्या हमारी संवेदना सिर्फ खबर पढ़ने तक सीमित रहेगी?
यह घटना शर्मनाक भी है…
और उम्मीद भरी भी।
क्योंकि जब तक ऐसे डॉक्टर, नर्स
और ममता से भरी महिलाएँ मौजूद हैं,
तब तक—
मानवता पूरी तरह मरी नहीं है।
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