25–30 साल बाद “मृत” घोषित करने की साज़िश!
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फर्जी दस्तावेज़ों से मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने का प्रयास — कानून की खुली अवहेलना**


अनूपपुर / बुढ़ार।
ग्राम पंचायत रामपुर (जनपद पंचायत बुढ़ार, जिला शहडोल) से सामने आया मामला केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि भारतीय दंड संहिता और नागरिक पंजीकरण कानूनों के सीधे उल्लंघन का गंभीर उदाहरण है।
उपलब्ध दस्तावेज़ों के अनुसार, रामचरण गुप्ता नामक व्यक्ति, जो 25–30 वर्ष पूर्व ग्राम पंचायत रामपुर छोड़ चुका था, उसे मृत घोषित कराने हेतु शपथ-पत्र, पंचनामा और पंचायत पत्रों के माध्यम से मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने का प्रयास किया गया।
कानूनी दृष्टि से गंभीर अपराध क्यों?
1. मृत्यु पंजीकरण कानून का उल्लंघन
भारत में मृत्यु का पंजीकरण Births & Deaths Registration Act, 1969 के अंतर्गत होता है।
कानून के अनुसार—
मृत्यु का पंजीकरण घटना के 21 दिन के भीतर अनिवार्य है
विलंब होने पर सक्षम अधिकारी की अनुमति और ठोस प्रमाण आवश्यक होते हैं
➡️ इस मामले में ना अस्पताल रिकॉर्ड,
➡️ ना पोस्टमार्टम रिपोर्ट,
➡️ ना शासकीय मृत्यु पंजीकरण प्रमाण उपलब्ध है।
यह सीधे तौर पर अवैध पंजीकरण का प्रयास है।
2. फर्जी शपथ-पत्र और झूठा पंचनामा — IPC के तहत अपराध
दस्तावेज़ों में लगाए गए शपथ-पत्र और पंचनामा यदि असत्य पाए जाते हैं, तो यह—
धारा 191 IPC — झूठी शपथ
धारा 193 IPC — झूठी गवाही
धारा 199 IPC — झूठा बयान सरकारी अभिलेख हेतु
के अंतर्गत दंडनीय अपराध बनता है।
3. फर्जी दस्तावेज़ बनाकर लाभ लेने की साज़िश
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, मृत्यु प्रमाण पत्र का दुरुपयोग प्रायः—
भूमि/संपत्ति हड़पने
उत्तराधिकार बदलने
सरकारी योजनाओं का लाभ लेने
रिकॉर्ड में व्यक्ति को मृत दिखाकर लेन-देन करने
जैसे मामलों में किया जाता है।
➡️ यह स्थिति धारा 420 IPC (धोखाधड़ी) और
➡️ धारा 468 IPC (जालसाजी) को आकर्षित करती है।
4. पंचायत और सत्यापन अधिकारियों की जिम्मेदारी
दस्तावेज़ों पर पंचायत स्तर के हस्ताक्षर और मुहर होना यह संकेत देता है कि—
बिना ठोस प्रमाण सत्यापन किया गया
नियमों की अनदेखी या मिलीभगत की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता
यदि जांच में यह सिद्ध हुआ कि—
अधिकारियों ने जानबूझकर लापरवाही की
या गलत तथ्यों के आधार पर प्रमाणन किया
तो उनके विरुद्ध—
धारा 217 IPC (लोक सेवक द्वारा कानून की अवहेलना)
धारा 218 IPC (गलत रिकॉर्ड तैयार करना)
के तहत कार्रवाई संभव है।
5. शिकायत और प्रशासनिक हस्तक्षेप
मामले को लेकर तहसीलदार बुढ़ार को लिखित शिकायत दी गई है, जिसमें—
✔️ मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने पर रोक
✔️ संपूर्ण दस्तावेज़ों की जांच
✔️ दोषियों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज करने
✔️ पंचायत व संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच
की स्पष्ट मांग की गई है।
कानूनी सवाल जो अब प्रशासन के सामने हैं
जब व्यक्ति 25–30 वर्षों से ग्राम में निवासरत ही नहीं था, तो मृत्यु की पुष्टि कैसे की गई?
बिना अस्पताल/पंजीकरण रिकॉर्ड के आवेदन कैसे स्वीकार हुआ?
शपथ-पत्र और पंचनामा किस आधार पर तैयार किए गए?
पंचायत स्तर पर नियमों की अनदेखी क्यों की गई?
क्या इसके पीछे संपत्ति या अन्य लाभ का उद्देश्य है?
निष्कर्ष
यह मामला सिर्फ फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र का नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था में सेंध लगाने की सुनियोजित कोशिश का संकेत देता है। यदि समय रहते कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो ऐसे प्रकरण भविष्य में कानूनी अराजकता को जन्म दे सकते हैं।
अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले को औपचारिक फाइल बनाकर दबाता है या कानून के अनुसार कार्रवाई कर उदाहरण पेश करता है।



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