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March 3, 2026

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कागजों में तय होता जंगल का भविष्य ?  कोल ब्लॉक की “फाइल गाथा “

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धरमजयगढ़ –  पुरुँगा, साम्हर सिंघा, तेन्दुमुड़ी कोकदार में मेसर्स अंबुजा सीमेंट लिमिटेड की प्रस्तावित परियोजना को लेकर एक गंभीर और चौंकाने वाला विरोधाभास नजर आ रहा है। काग़ज़ों में जिस क्षेत्र को राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, टाइगर रिज़र्व, हाथी कॉरिडोर और वन्यजीव प्रवासन मार्ग से पूरी तरह अलग बताया गया है, उसी क्षेत्र में एशियाई हाथी, भारतीय पैंगोलिन, स्लॉथ भालू, जंगल बिल्ली और भारतीय लोमड़ी जैसे दुर्लभ और संवेदनशील वन्यजीवों की मौजूदगी को आधिकारिक रूप से दर्ज किया गया है। यह तथ्य अपने आप में सवाल खड़ा करता है कि अगर क्षेत्र में हाथी और अन्य दुर्लभ जीव मौजूद हैं, तो उसे वन्यजीव दृष्टि से असंवेदनशील कैसे माना जा सकता है ? दस्तावेज़ के अनुसार परियोजना क्षेत्र न तो किसी संरक्षित वन क्षेत्र का हिस्सा है और न ही किसी बफर ज़ोन में आता है, लेकिन इसी दस्तावेज़ में यह भी स्वीकार किया गया है कि क्षेत्र जैव विविधता से समृद्ध है। यह विरोधाभास केवल तकनीकी भूल नहीं लगता, बल्कि यह उस प्रक्रिया की ओर इशारा करता है जिसमें काग़ज़ों में “नहीं” लिखकर ज़मीन की वास्तविक स्थिति को हल्का साबित किया जाता है। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि जहां हाथियों का विचरण दर्ज हो, वहां उस क्षेत्र को कम से कम प्रवासन या संवेदनशील क्षेत्र मानकर विशेष सावधानी बरती जानी चाहिए, लेकिन यहां उलटा रास्ता अपनाया गया है। यह तथ्य भी सामने आया है कि परियोजना क्षेत्र में पारसा, सफेद मूसली, काली मूसली, बीजा, रामदातून और कोहा जैसी औषधीय और पारिस्थितिकी दृष्टि से महत्वपूर्ण वनस्पतियाँ मौजूद हैं। इनका उल्लेख दस्तावेज़ों में तो किया गया है, लेकिन इन पर परियोजना के दीर्घकालिक प्रभाव का कोई ठोस आकलन दिखाई नहीं देता ।  जानकारों के अनुसार यही वनस्पतियाँ ग्रामीण और आदिवासी समुदायों की पारंपरिक आजीविका और स्वास्थ्य से जुड़ी हुई हैं, ऐसे में इनके नुकसान को महज़ औपचारिक जानकारी मान लेना क्या गंभीर लापरवाही नहीं है ? काग़ज़ों में क्षेत्र को संरक्षित न बताने के बावजूद वहां मौजूद वन्यजीव और वनस्पतियाँ यह साफ संकेत देती हैं कि इलाका पर्यावरणीय रूप से अत्यंत संवेदनशील है। सवाल यह है कि क्या पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रिया अब केवल कॉलम भरने और औपचारिक उत्तर देने तक सीमित रह गई है। क्या किसी क्षेत्र की संवेदनशीलता केवल तब मानी जाएगी, जब वह सरकारी नक्शे में विशेष रंग से चिह्नित हो।
यह  केवल एक परियोजना की कहानी नहीं कहती, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल उठाती है, जिसमें काग़ज़ी घोषणाओं के सहारे जंगलों और वन्यजीवों के भविष्य का फैसला किया जा रहा है। अब सवाल यह है कि ऐसे मामलों में जवाबदेही किसकी है और ज़मीन की सच्चाई कब तक फाइलों के नीचे दबी रहेगी।

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