पुरुंगा कोयला खदान: वन भूमि और पर्यावरण पर गहराता संकट
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धरमजयगढ़ वनमंडल के अंतर्गत पुरुंगा, कोकदर और समरसिंघा गांवों में प्रस्तावित कोयला खनन परियोजना को लेकर गंभीर तथ्य सामने आए हैं। वन संरक्षण अधिनियम के तहत किए गए स्थल निरीक्षण और आधिकारिक अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि यह परियोजना बड़े पैमाने पर वन भूमि के उपयोग, वृक्ष और पर्यावरणीय दबाव से जुड़ी हुई है।
प्रस्तावित परियोजना के लिए कुल 621.331 हेक्टेयर वन भूमि परिवर्तन प्रस्तावित है इसमें से 9.982 हेक्टेयर वन भूमि को इक्वालाइन वर्क और अधोसंरचना कार्य हेतु उपयोग में लाने की अनुमति मांगी गई है। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार प्रस्तावित परियोजना क्षेत्र में कुल 4368 वृक्ष दर्ज हैं, जो प्रस्तावित कार्य की परिधि में आते हैं। क्षेत्र की जैव विविधता के लिए यह गंभीर चिंता का विषय है।
निरीक्षण रिपोर्ट में बताया गया है कि आवेदन क्षेत्र में वन संरक्षण अधिनियम का उल्लंघन नहीं पाया गया है, और मांगी गई वन भूमि को गैर वानिकी प्रयोजन हेतु अनुशंसा की गई है। हालांकि, यह भी दर्ज है कि क्षेत्र में वन घनत्व मध्यम स्तर का है तथा यहां प्राकृतिक पुनरुत्पादन की स्थिति भी मध्यम श्रेणी में आती है।
प्रस्तावित खनन क्षेत्र के आसपास से आमापाली से हाटी तक की सड़क गुजरती है, जिसे मानचित्र में दर्शाया गया है। वहीं यह क्षेत्र राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, जैवमंडल क्षेत्र, प्राकृतिक जल स्रोत, आदिवासी बसाहट अथवा धार्मिक स्थलों की दस किलोमीटर की परिधि में नहीं आता, ऐसा रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है।
इसके बावजूद यह तथ्य अनदेखा नहीं किया जा सकता कि परियोजना के बीस किलोमीटर के दायरे में पहले से ही कई अन्य कोयला खदानें स्थित या प्रस्तावित हैं। इससे स्पष्ट है कि पूरा क्षेत्र पहले ही खनन गतिविधियों के दबाव में है और नई परियोजना इस दबाव को और बढ़ा सकती है।
राजस्व और वन भूमि के विस्तृत विवरण से यह भी सामने आता है कि सैकड़ों खसरा नंबरों की भूमि इस परियोजना के दायरे में आ रही है, जिसका कुल क्षेत्रफल 234.320 हेक्टेयर से अधिक बताया गया है। यह स्थिति स्थानीय पर्यावरण, वन्यजीवों और ग्रामीण जीवन पर दूरगामी प्रभाव डाल सकती है।
वनमंडलाधिकारी द्वारा किए गए स्थल निरीक्षण के आधार पर दी गई अनुशंसा भले ही प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हो, लेकिन हजारों पेड़ों की कटाई और बड़े वन क्षेत्र के खनन में जाने से क्षेत्र की हरित पहचान पर गहरा आघात पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। अब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि विकास के नाम पर पर्यावरण और भविष्य की कीमत कितनी चुकाई जाएगी।


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