शासन की प्रेस कॉन्फ्रेंस में भाजपा पदाधिकारी क्यों?*
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*अनूपपुर में उठे लोकतंत्र और मीडिया सम्मान से जुड़े गंभीर सवाल*

अनूपपुर।मध्य प्रदेश राज्य सरकार के कार्यकाल के दो वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर शुक्रवार को अनूपपुर जिला जनसंपर्क कार्यालय में आयोजित शासन की प्रेस कॉन्फ्रेंस अब एक प्रशासनिक कार्यक्रम न रहकर राजनीतिक और लोकतांत्रिक विवाद का केंद्र बन गई है। शासन की उपलब्धियों और विकास कार्यों की जानकारी देने के उद्देश्य से बुलाई गई इस प्रेस कॉन्फ्रेंस की मर्यादा उस समय टूटती नजर आई, जब पत्रकारों को अपनी सीटों से उठाकर भाजपा पदाधिकारियों को बैठाया गया।
इस कार्यक्रम में प्रदेश के वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री तथा अनूपपुर जिले के प्रभारी मंत्री दिलीप अहिरवार की उपस्थिति थी। लेकिन कार्यक्रम का संचालन जिस प्रकार किया गया, उसने सरकारी मंच और पार्टी मंच के अंतर को धुंधला कर दिया।
*पत्रकारों की गरिमा से समझौता, प्रेस कॉन्फ्रेंस का बहिष्कार*
घटना से आहत कई पत्रकारों ने इसे अपनी पेशेवर गरिमा और सम्मान पर सीधा आघात मानते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस का बहिष्कार कर दिया। देखते ही देखते शासन का औपचारिक कार्यक्रम राजनीतिक विवाद में तब्दील हो गया।
जब इस पूरे घटनाक्रम पर प्रभारी मंत्री से सवाल किया गया तो उनका स्पष्ट बयान था “इस कॉन्फ्रेंस में भाजपा के पदाधिकारी रहेंगे।”
इस एक वाक्य ने विवाद को और गहरा कर दिया।
*सबसे बड़ा सवाल ,यह शासन का कार्यक्रम था या पार्टी का?*
पत्रकारों और मीडिया संगठनों का कहना है कि यदि यह शासन की प्रेस कॉन्फ्रेंस थी, तो इसमें पत्रकारों की उपस्थिति, सुविधा और सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए था।और यदि यह भाजपा का राजनीतिक कार्यक्रम था, तो फिर इसे सरकारी जनसंपर्क कार्यालय द्वारा ‘शासन की प्रेस कॉन्फ्रेंस’ बताकर क्यों आयोजित किया गया?
यहीं से सबसे गंभीर प्रश्न जन्म लेता है,सरकारी मंच और राजनीतिक दल के मंच के बीच की रेखा आखिर किसने और क्यों मिटा दी?

*जनसंपर्क विभाग की भूमिका पर भी सवाल*
लोकतंत्र में जनसंपर्क विभाग को शासन और मीडिया के बीच सेतु माना जाता है। ऐसे में उसी मंच पर पत्रकारों के साथ इस तरह का व्यवहार न केवल प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता और संवैधानिक मर्यादाओं पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
यह घटना केवल कुर्सियों की अदला-बदली नहीं थी, बल्कि यह संकेत है कि कहीं न कहीं सरकारी संसाधनों का उपयोग राजनीतिक प्राथमिकताओं के अनुसार तो नहीं हो रहा।
*जनमानस और लोकतंत्र पर असर*
आज जब लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है, तब इस तरह की घटनाएं जनविश्वास को कमजोर करती हैं। जनता यह जानना चाहती है कि क्या शासन की उपलब्धियों की जानकारी देना अब पार्टी उपस्थिति पर निर्भर होगा?
क्या पत्रकारों को सवाल पूछने से पहले यह देखना होगा कि मंच पर किस दल के पदाधिकारी बैठे हैं?
*अब जवाब जरूरी*
फिलहाल यह मामला पूरे अनूपपुर जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है। पत्रकारों में गहरी नाराजगी है और वे स्पष्ट, सार्वजनिक और लिखित स्पष्टीकरण की मांग कर रहे हैं।
अब देखना यह होगा कि शासन और जिला प्रशासन इस पूरे घटनाक्रम से सबक लेते हुए लोकतांत्रिक मर्यादाओं की पुनर्स्थापना करता है, या फिर यह विवाद भी अन्य मामलों की तरह समय के साथ दबा दिया जाएगा।
यह मामला केवल अनूपपुर का नहीं, बल्कि प्रदेश में शासन, राजनीति और मीडिया के रिश्तों की दिशा तय करने वाला उदाहरण बन सकता है।
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