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बिना गलती की सज़ा: सिंह वाहिनी महिला स्व सहायता समूह से लगातार तीसरे सीजन उपार्जन छिना

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प्रशासनिक लापरवाही या महिलाओं के साथ खुला अन्याय?

सतना | उचेहरा तहसील | उरदना

उरदना ग्राम की सिंह वाहिनी महिला स्व सहायता समूह के साथ जो हुआ, वह न सिर्फ प्रशासनिक संवेदनहीनता का उदाहरण है, बल्कि महिला सशक्तिकरण के दावों पर सीधा तमाचा भी है।

धान उपार्जन 2022-23 से लेकर लगातार चार सीजन तक सफलतापूर्वक कार्य कर चुका यह समूह धान उपार्जन 2024-25 से वंचित कर दिया गया। कारण बताया गया—

> 01/11/2024 की स्थिति में समूह के खाते में 2 लाख रुपये नहीं थे।



हकीकत: पैसा था, गलती बैंक की थी

समूह के खाते में ₹2,99,000 रुपये 30/10/2024 को बैंक द्वारा ट्रांसफर किए गए थे, लेकिन तकनीकी कारणों से राशि सिस्टम में शो नहीं हो रही थी।
इस संबंध में बैंक ने अपने लेटर पैड पर लिखित प्रमाण दिया कि

> 01 नवंबर 2024 को समूह के खाते में ₹4,96,821 की राशि उपलब्ध थी।



इसके बावजूद तत्कालीन जिला खाद्य अधिकारी और तत्कालीन कलेक्टर ने बैंक प्रमाण को नजरअंदाज करते हुए समूह को उपार्जन से बाहर कर दिया।

जब संज्ञान लिया गया, तब बहुत देर हो चुकी थी

समूह द्वारा लगातार शिकायतों के बाद जब मामले पर ध्यान दिया गया, तब तक धान उपार्जन कार्य समाप्त हो चुका था।
महिलाओं को यह कहकर संतुष्ट कर दिया गया कि—

> “गेहूं उपार्जन में कार्य दिया जाएगा।”



लेकिन यह भरोसा भी खोखला निकला।

नया नियम, पुराना अन्याय

नए कलेक्टर माननीय सतीश कुमार यस के आने के बाद नियम बनाया गया कि—

> जिन समूहों ने लगातार उपार्जन कार्य किया है, उन्हें ही आगे कार्य दिया जाएगा।



विडंबना यह है कि सिंह वाहिनी समूह ने तो लगातार कार्य किया था, फिर भी उसी नियम का हवाला देकर इस समूह को
👉 दो और सीजन उपार्जन से वंचित कर दिया गया।
और इस सीजन भी समूह को कोई कार्य नहीं मिला।

सवालों के कटघरे में प्रशासन

जिन समूहों के खाते में सचमुच राशि नहीं थी, उन्हें वंचित रखना समझ में आता है

लेकिन जिस समूह के खाते में राशि थी और जिसे बैंक ने प्रमाणित किया, उसे सज़ा क्यों?

क्या यह महिलाओं के साथ प्रशासनिक अन्याय नहीं है?

क्या तकनीकी गलती की कीमत महिला समूह चुकाएगा?


“ईमानदार कलेक्टर” की छवि और महिलाओं पर दाग

समूह की महिलाओं का कहना है कि—

> हमने सुना था कि सतना कलेक्टर हमेशा सही निर्णय लेते हैं, लेकिन आज हमें जनता के बीच बेईमान घोषित किया जा रहा है।



यह मामला अब सिर्फ उपार्जन का नहीं रहा, बल्कि समूह की सामाजिक प्रतिष्ठा का भी बन चुका है।

आज भी पात्र, फिर भी वंचित—क्यों?

सरकार की वर्तमान नीति के अनुसार सिंह वाहिनी महिला स्व सहायता समूह आज भी पूरी तरह पात्र है, फिर भी उन्हें इस सीजन उपार्जन कार्य नहीं दिया गया।

❓ आखिर बिना गलती के कब तक यह समूह सज़ा भुगतता रहेगा?
❓ क्या महिला सशक्तिकरण सिर्फ कागज़ों तक सीमित है?

न्याय की मांग

सिंह वाहिनी महिला स्व सहायता समूह की मांग है कि—
✔ उन्हें तत्काल उपार्जन कार्य दिया जाए
✔ दोषी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय हो
✔ तकनीकी गलती का खामियाजा महिलाओं से न वसूला जाए

अब देखना यह है कि सतना प्रशासन न्याय करता है या चुप्पी साधे रहता है।

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