पर्यावरण एवं पर्यटन अंक – 37 संकल्प शक्ति का पर्याय है गेज नदी का विशाल स्वरूप “गेज बांध” बीरेन्द्र श्रीवास्तव की कलम से
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संभाग ब्यूरो दुर्गा गुप्ता
छत्तीसगढ़ राज्य के उत्तर पश्चिम में बसा कोरिया जिला जहां अपनी प्राकृतिक सुंदरता और जैव विविधता और गुरु घासीदास तैमोर पिंगला राष्ट्रीय उद्यान एवं बाघ अभ्यारण के लिए जाना जाता है वही यहां की छोटी-छोटी नदियों को भी विशालता प्रदान करने की कोशिश इस जिले को पर्यटन के आकर्षण से बांधती रही है। यहां हसदो की सहायक दो छोटी गेज और झुमका जैसी नदियां और इन छोटी नदियों पर बने बड़े बांध इस जिले की कानों की ऐसी दो बालियां हैं जो इसे पूरी सुंदरता प्रदान करती है। आईए जीवन के लिए आवश्यक पानी और पर्यटन के इस संबंधों को जानने की कोशिश करते हैं।


पृथ्वी पर जीवन का मूल मंत्र है हवा पानी और वातावरण इसकी अनुकूल परिस्थितियों ही ब्रह्मांड की हमारी निहारिका में पृथ्वी को जीवन की समृद्धता प्रदान करती है। जीवन की आवश्यकताओं में से एक की कमी या उसकी समाप्ति पृथ्वी से जीवन को समाप्त करने के लिए पर्याप्त है। प्रकृति ने वातावरण के अनुकूल बनाए रखने के लिए अन्य तत्वों को एक दूसरे की सहायक बना रखा है ताकि एक दूसरे तत्व को संतुलित किया जा सके और जीवन बचा रहे। हवा के बारे में चर्चा करने पर हमें देश की राजधानी दिल्ली की याद आती है जो आज सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों की श्रेणी में आ चुका है। हमारे छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर भी इस कड़ी की गिनतियां में शामिल है। स्वाभाविक है प्रदूषण बढ़ेगा तब ऑक्सीजन घटेगा एवं जीवन को प्रभावित करेगा। इसी तरह जल के बारे में बहुत प्रचलित मुहावरा बन चुकी पंक्तियां जगह-जगह आपको देखने को मिल जाती हैं “जल ही जीवन है” नदी तालाबों से लेकर जलप्रदाय के स्थल तक यह आपको लिखी दिखाई देती है यह अलग पक्ष है कि इसके प्रति लोगों की गंभीरता कितनी होती है।
अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के अनुसार अंतरिक्ष से पृथ्वी नीले हरे रंग की दिखाई पड़ती है। जो इसके विशाल सागर के कारण दिखाई पड़ता है इसके साथ ही पानी के स्रोत बादलों का समूह भी इसके ऊपर यहां वहां दिखाई देता है। हरा रंग हमारी पृथ्वी की वन संपदा हरीतिमा और वातावरण को प्रदर्शित करता है। पृथ्वी पर पाया जाने वाला जल दो भागों में बंटा हुआ है। पहला सागर का खारा जल और दूसरा कुंए तालाब नदियों से मिलने वाला पीने योग्य पानी जिसे मीठा जल कहा जाता है। पृथ्वी पर जीवन दोनों प्रकार के जल में विकसित होता है लेकिन मानव जीवन सहित समुद्र से बाहर रहने वाले जीव जंतु केवल मीठे पानी से ही जीवन प्राप्त करते हैं। जीवन को बचाए रखने में पानी और आपके सम्मान का पर्याय पानी की भूमिका पर कवि रहीम ने कई अर्थों में पानी को परिभाषित करते हुए व्यक्त किया है —
“रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून” ।
” पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष चून”
मानव जीवन के साथ पानी के महत्व को परिभाषित करती उक्त पंक्तियां जीवन की सार्थकता प्रदान करने में पानी को एक सशक्त माध्यम बताया है।
पानी के महत्व को स्वीकार करते हुए मीठे पानी के मुख्य जल स्रोतों की कहानी में देश की कई छोटी बड़ी नदियां शामिल है,जिन्हें हम माता कहते हैं। इसमें गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र सरस्वती सिंधु कावेरी कृष्णा नर्मदा, कावेरी, महानदी और ताप्ती है। यह नदियां स्वयं किसी पहाड़ के छोटे श्रोत या खेत के ढोढ़ी स्थल से निकलकर जब धीरे-धीरे आगे बढ़ती हैं और अपने सहयोगी नदी नालों को साथ समेटती हुई उनकी छोटी-छोटी जलधाराओं से समृद्ध होती हैं तब बड़ी नदियों का नाम पाती है किंतु उन छोटे-छोटे नालों का भी स्थानीय भाषा में जल स्रोत होने के कारण ग्रामीण जन उन्हें माता का दर्जा देकर नदी का ही नाम देते हैं। छत्तीसगढ़ से निकलने वाली नदियों में उत्तरी छत्तीसगढ़ के कैमूर की पहाड़ियों के विस्तार में सोनहत की पहाड़ियां कई नदियों को जन्म देती हैं। जिसमें हसदो और गोपद प्रमुख नदियां हैं। इसी पहाड़ी के दूसरी ओर छोटी-छोटी जलधाराओं का स्रोत गेज नदी के रूप में आगे बढ़ती है। उद्गम की छोटी जलधारा को देखकर इस नदी पर किसी बांध की कल्पना नहीं की जा सकती किंतु जल संरक्षण की सोच एवं छोटी नदी को विशालता प्रदान करने का संकल्प लिए कोरिया विधायक एवं तत्कालीन जल संसाधन मंत्री स्व. रामचंद्र सिंह देव, (कोरिया कुमार) ने इस मध्यम सिंचाई परियोजना का बांध का निर्माण की जिम्मेदारी ली और इसे पूरा कर अपनी सशक्त संकल्प शक्ति का परिचय दिया है। इस बांध के निर्माण के पीछे उनकी सोच भविष्य के विकास के साथ अंचल के निवासियों को पीने और निस्तार के पानी के साथ-साथ आसपास के ग्रामीणों के खेतों की सिंचाई की व्यवस्था करना था। विकास एवं बढ़ती आबादी के बीच आज गेज बांध के निर्माण की सार्थकता के साथ, आज भी वे अंचल के निवासियों के बीच याद किए जाते हैं।
. आईए गेजनदी और बांध के उद्गम की रोचक यात्रा की ओर चले जो आपको पग पग पर रोमांचित करती है। बैकुंठपुर से सोनहत की खूबसूरत पहाड़ियों का मार्ग राष्ट्रीय राजमार्ग 43 के चौराहे से उत्तर पश्चिम दिशा की ओर जाने का इशारा करता है। यह चौराहा बैकुंठपुर शहर के मुख्यालय से लगभग 04 किलोमीटर दूर है। सोनहत जाने के दौरान आपके मार्ग को अनूपपुर – अंबिकापुर की रेल लाइन काटती हुई चलती है जिसके उपर बने समपार फाटक को बंद कर अब बदलते समय के अनुसार रेल विभाग ने रेल लाइन के नीचे से सड़क विकसित कर समपार फाटक को बंद कर दिया है। यहां से आगे बढ़कर लगभग 04 किलोमीटर आगे चेरवापारा गांव पहुंचकर आप एक बोर्ड देखकर ठिठक जाते हैं। सड़क मार्ग पर लिखा हुआ बोर्ड दिखाई देता है “गेज मध्यम परियोजना जल संसाधन विभाग बैकुंठपुर” शून्य किलोमीटर, और दाहिनी दिशा की ओर एक तीर का निशान दिखाई पड़ता है। सड़क मार्ग से दाहिने घूमते ही घना आम्र कुंज आपका स्वागत करता है। फरवरी के महीने में आम के बौरों से लदा हुआ यह आम का बगीचा भौरों के गुनगुनाने की एक जानी पहचानी जगह हो सकती है जिसके सुगंध से यह अंचल महक जाता होगा। संभवत वर्षों पहले यहां विशाल आम्रकुंज रहा होगा जो बांध के क्षेत्र में आ जाने के कारण अब छोटा हो चला है। लेकिन बरसों बाद भी अपने फलों और आम के बौरों के सुगंध में कोई कमी नहीं आने दी है। सामने ऊंचे पत्थरों से बंधा गेज बांध अपनी विशाल बाहें फैलाए अपनी मजबूती और विशालता का परिचय देता है। जहां ऊंचाई तक पहुंचने के लिए मध्य में बनी सीढ़ीयों से आपको ऊपर चलना होगा। ऊपर जाने के बाद ऐसा प्रतीत होता है मानो इस बांध की बड़ी-बड़ी भुजाएं इस विशाल समुद्र जैसे पानी की को इधर-उधर भागने से रोकने की कोशिश कर रही है। इसी बांध के गेट से सिंचाई विभाग ने छोटा द्वार खोल दिया है जो सड़क पार करता हुआ छोटे जल धारा में इस तरह आगे बढ़ता है मानो घुटनों के बल चलता कोई बच्चा तेजी से आगे भागने की कोशिश कर रहा हो। जल के बहाव की किलकारी के साथ वह रुककर पीछे भी देखता है कि कोई व्यक्ति उसे पीछे पकड़ने तो नहीं आ रहा है। आम की झुकी हुई डालियों के झुरमुट के बीच से आगे बढ़ने पर इसी जल का एक हिस्सा नाला काटकर शिवपुर छरछा गांव एवं कोयला कर्मचारियों को जलापूर्ति के लिए बनाए गए पंप हाउस के कुएं में पहुंचता है जहां से पूरी बस्ती को पीने और निस्तार का पानी पहुंचाया जाता है। आगे की ओर बढ़ता यह नाला धीरे-धीरे बैकुंठपुर तक पहुंचता है जहां इसका जल बैकुंठपुर जिला मुख्यालय के आम नागरिकों के पीने एवं निस्तार के काम आता है। इसी नदी पर बना पुल कोरिया जिले को अंबिकापुर एवं आगे झारखंड तथा बनारस जाने के अंतर्राज्यीय मार्ग से जोड़ता है। यह पुल पुराने समय से बैकुंठपुर की सीमा रेखा भी कहलाती है क्योंकि इसके पार होते ही थोड़ी दूर आगे बढ़ते ही दूसरे गांव मांड़ी की सीमाएं प्रारंभ हो जाती हैं।
गेज बांध का कुल क्षेत्रफल लगभग 38 हैक्टेयर है जिसमें भरने वाले पानी की मात्रा वर्षा जल से आने वाले जल के कारण बदलती रहती है क्योंकि छोटे-छोटे सहयोगी नदी नालों का बहने का असर भी इस पर प्रभाव डालता है। लगभग 05 दशक पूर्व बने गेज बांध में जमी गाद और कचरा भी इसकी जल भराव क्षमता को प्रभावित करती है। यह बांध पीने के पानी के साथ दस गांवों के लगभग 1100 किसान परिवारों को सिंचाई संसाधन उपलब्ध कराती है, लेकिन बरसात की कमी के बीच कई बार सिंचाई के पानी को बंद भी करना पड़ता है। अभी पिछले वर्ष 2024 में पानी की कमी के कारण सिंचाई के लिए पानी बंद करना पड़ा था। बांध के ऊपरी हिस्से में काफी चौड़ी मेढ़ बांधी गई है, जिस पर से गाड़ियां मोटरसाइकिल आने जाने का साधन ग्रामीण जनों के लिए उपलब्ध है। यह मेढ़ एक गांव से निकलकर आगे दूसरे गांव को जोड़ता है। इस विशाल बांध का गहरा नीला जल भराव आपको बरबस ही आकर्षित करता है। इस बांध के किनारे उगे हुए जलीय वनस्पतियां कि फैलाव एवं काई की विभिन्न प्रजातियों का रंग बिरंगा आकर्षण आपको एकटक देखने को बाध्य करता है। पानी के भीतर और बाहर पौधों का फैलाव जहां एक ओर स्वस्थ जैव विविधता को प्रदर्शित करता है वही इनका सामूहिक निवास अलग-अलग रंगों से बांध को सुंदरता प्रदान करता है। यहां पहुंचकर आप कुछ देर ठहर कर इसे जरुर देखना चाहेंगे। जल और जलीय पौधों का यह आकर्षण आपको घंटों बांधकर रखता है। विशाल जल का फैलाव और वहां उत्पन्न होती छोटी-छोटी रंग बिरंगी वनस्पतियों के साथ दूर तक फैली बांध की बांहें आपको नीचे विकसित किए गए उद्यान विभाग के विकसित किए गए उद्यान तक ले जाते हैं जहां नारियल,आम, लीची, जैसे पौधों सहित सौंदर्य वर्धक पौधे लगाए गए हैं जो आपको अपने बगीचे के लिए भी उपलब्ध कराए जाते हैं। बांध का निचला हिस्सा होने के कारण जमीन में व्याप्त पर्याप्त नमी इस उद्यानिकी विभाग के पौधों को मिलती रहती है। यहां तक पहुंचाने के लिए बांध मार्ग की बजाय आपको नीचे के मार्ग से जाना ज्यादा आसान और उचित होगा।
गेज नदी एक छोटी नदी है जो एक पहाड़ी के दरारों के बीच जगह बनाती हुई धीरे धीरे आगे बढ़ती है और अपने साथ दो-तीन छोटी-छोटी जलधाराओं को लेकर आगे एक जलाशय में समा जाती है। इसे हम नाग डबरा के नाम से जानते हैं। इसी नाग- डबरा जलाशय का पानी जब अपने पूरे भराव के बाद आगे बढ़ता है तब यह गेज नदी का नाम प्राप्त करता है। बैकुंठपुर और पटना के बीच स्थित इस मुरमा गांव की पहाड़ियों तक की यात्रा बैकुंठपुर से या पटना नगर पंचायत दोनों से तय की जा सकती है। यहां पहुंचने के लिए बैकुंठपुर से सोनहत मार्ग पर चलना होगा। जी हां, यह वही सोनहत की पहाड़ियां हैं जहां से हसदो और गोपद नदी निकलती है। सोनहत पहाड़ के उत्तर पूर्व दिशा से निकलकर यही हसदों नदी जिले के दक्षिण पश्चिमी भाग को सिंचाई संसाधन उपलब्ध कराती है और आगे बढ़ती हुई कोरबा नगर तक पहुंचती है। कोरबा पहुंचने से पहले बांगो नदी के साथ यह बांगो बांध का निर्माण करती है जो कोरबा में पहुंचकर लगभग 08 से अधिक बिजली उत्पादन केंद्रों को पानी उपलब्ध कराती है। इस जल के माध्यम से आज कोरबा नगर लगभग 8000 मेगा वाट बिजली पैदा कर विद्युत सूर्य कहलाता है। मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों को अपने बिजली से रोशन करने वाली यह नगरी देश की उर्जा नगरी के नाम से पूरे देश में जानी जाती है।
गेज नदी के उद्गम तक जाने की यात्रा में सोनहत मुख्य मार्ग मे कठगोढ़ी गांव की चढ़ाई से पहले सड़क पर दाहिनी दिशा की ओर तीर का निशान लगाकर लिखा हुआ है ” मुरमा” गांव। दाहिनी ओर मुड़कर आप मुख्यमंत्री ग्राम सड़क विकास योजना मार्ग से जब आगे बढ़ते हैं तब रास्ते में आपको मोरगा जलाशय योजना का बोर्ड भी दिखाई देता है। इसी मार्ग से आगे बढ़ते हुए सोनहत जाने वाले मुख्य मार्ग से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद आप ललन चौक (तिराहे) पर पहुंचते हैं। यहां से बाईं ओर जाने वाली सड़क आपको पूटा गांव पहुंचाती है। इसी पूटा से पक्की सड़क आगे बढ़ती हुई बाई और चूड़ी पार होते हुए तुम्बी बाड़ी ग्राम के स्कूल के आगे पहुंचकर 02 किलोमीटर चलने के बाद दो-तीन पहाड़ियों से घिरा स्थल दिखाई पड़ता है जिसे नाग डबरा जलाशय कहा जाता है। यहीं पर गाय चराते हुए चरवाहे से पूछने पर कहता है कि गेज का उद्गम आपको कहां दिखाई देगा बाबू, वह तो छोटे-छोटे जलधारा के रूप में पहाड़ों के भीतर से निकलता है और एकत्र होकर इस नागडबरा जलाशय में भरता जाता है। यह जलाशय जब पानी से पूरा भर जाता है तब पानी आगे बढ़कर ढलान में बहने लगता है। हम लोग इसी को गेज कहते हैं। इसी गेज में ढेकी नाला, घाघी नाला, जैसे छोटे-छोटे नाले मिलते जाते हैं और आगे चलकर यही गेज बड़े बांध का रूप पाती है। नागडबरा की पहाड़ियों के बारे में पूछने पर कहता है कि यह तो चामड़ पहाड़ के उत्तर में और लइकिनगढ़ पहाड़ी के बीच बंधा हुआ है।
चरवाहे से लंबी बातचीत करते और पहाड़ियों के बीच इस नाग डबरा की जानी अनजानी कहानियों को सुनते- सुनते इस ठंड की शाम में कब चार बज गए इस बात का पता ही नहीं चला। ढलती शाम देख चरवाहे ने कहा बाबू अब रकरा बैला समेटे जात हौं, चले कर बेरा होए गइस है, कहते कहते वह आगे बढ़ चला। अब सूरज भी पहाड़ियों के पीछे छिपने की तैयारी में है। लगभग 14 किलोमीटर की यात्रा कर जब हम गेज नदी के उद्गम की जानकारी लेकर लौटते हैं तब ऐसा लगता है की छोटी नदी पर बांध बनाने की कल्पना कोई तपस्वी या साधक ही कर सकता है। मध्य प्रदेश के 70 के दशक से लगातार बैकुंठपुर का प्रतिनिधित्व करने वाले जल संसाधन मंत्री रामचंद्र सिंह जूदेव का संकल्प ही इतने विशाल बांध के निर्माण की कल्पना को साकार कर सकता था। इस तरह के निर्माण के लिए संकल्पित व्यक्ति के नहीं रहने पर भी आज गेज जैसे बांध उनके नाम से याद किए जाते हैं। झुमका और गेज बांध बैकुंठपुर के कानों की ऐसी दो बालियां हैं। जिसकी विशाल क्षेत्र में फैली जलराशि का भंडार इस नगर का प्राकृतिक सौंदर्य बढ़ाती है और मानव जीवन को जीवन देने के साथ साथ यहां जलसंरक्षण और जैव विविधता को संरक्षित करने की दिशा में एक सशक्त कदम साबित हो रही है।
यदि आप हरी भरी वादियों के बीच शुद्ध हवा और नदियों पहाड़ों के पर्यटन के शौकीन है तब इस बार पर्यटन यात्रा के लिए बैकुंठपुर कोरिया आपको बुला रहा है। आप छत्तीसगढ़ के मानचित्र में कोरिया जिला मुख्यालय बैकुंठपुर तक पहुंच सकते हैं। बैकुंठपुर राष्ट्रीय राजमार्ग – 43 के कटनी – गुमला मार्ग से 4 किलोमीटर भीतर स्थित है। अपने प्राकृतिक सौंदर्य से सुसज्जित यह नगर अपने जल सौंदर्य पर्यटन के लिए आपको आमंत्रित कर रहा है। ट्रेन मार्ग से रायपुर तक पहुंच कर दुर्ग- अंबिकापुर एक्सप्रेस ट्रेन से भी यहां पहुंचा जा सकता है। अनूपपुर जंक्शन से भी बस एवं ट्रेन सेवा उपलब्ध है। बस मन बनाईए और निकल पड़िए इन पहाड़ों और चट्टानों के दर्द को महसूस करने के लिए बैकुंठपुर की यात्रा करने। कठोर चट्टानों से बहते जल स्रोत के साथ नदी, जलाशय और छोटी नदियों पर बने बड़े बांध का संकल्पित इतिहास को अपनी आंखों से देखने के लिए आपको बैकुंठपुर तक पहुंचना होगा। यहां साल वनों की वह वादियां हैं जो आपको बुला रही हैं। फरवरी मार्च के मौसम में इन्हीं साल वनों के फूल जब टूट कर अपनी डाली से नीचे गिरते है तब ऐसा लगता है मानो हजारों लाखों तितलियां के झुंड पंक्तिबद्ध होकर उड़ती हुई कहीं दूर जा रही हैं। जो आपके देखते ही देखते धीरे-धीरे उड़ती हुई आपकी आंखों से ओझल हो जाती है। इस बार आप जब भी बच्चों के साथ या मित्रों के साथ पर्यटन के लिए निकलें, अपने पर्यटन में इस नगर को शामिल करें। हमारा विश्वास है जीवन, जल और जल संरक्षण के साथ जैवविविधता से लगाव रखने वाले पर्यटक यहां आने के बाद एक नई ऊर्जा से भर जाएंगे।
बस इतना ही
फिर मिलेंगे किसी अगले पड़ाव पर
बीरेंद्र श्रीवास्तव, मनेन्द्रगढ़ 49744 2
संपर्क फोन 942558 1356
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