January 15, 2026

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ए. के. एस. विश्वविद्यालय की फैकल्टी श्रद्धा पांडेय का शोध– पर्यावरण हितैषी भवन निर्माण की ओर सशक्त कदम।
दि इंडियन खनन तथा अभियंत्रण पत्रिका, जून–जुलाई 2025 अंकमें प्रकाशित।

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सतना।  ए.के.एस. विश्वविद्यालय की सहायक प्राध्यापक श्रद्धा पांडेय ने स्थायी निर्माण सामग्रियों पर आधारित अत्यंत महत्त्वपूर्ण शोध–लेख “स्थायी निर्माण सामग्रियों में प्रगति – एक समीक्षात्मक अध्ययन” प्रस्तुत किया है। यह शोध बढ़ते शहरी विस्तार, तीव्र निर्माण गतिविधियों और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ते गम्भीर दबाव को ध्यान में रखते हुए पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक निर्णायक योगदान माना जा रहा है।श्रद्धा पांडेय ने अपने अध्ययन में परंपरागत निर्माण सामग्रियों से होने वाली अत्यधिक ऊर्जा–खपत, प्रदूषण, ताप–वृद्धि और संसाधनों की निरंतर कमी पर गहन विश्लेषण किया है। इस संदर्भ में केंद्रीय लोक निर्माण विभाग द्वारा निर्माण सामग्रियों की स्थिरता के मूल्यांकन हेतु निर्धारित 12 मानकों को भी स्पष्ट रूप से व्याख्यायित किया गया है, जो भविष्य की निर्माण पद्धतियों को अधिक उत्तरदायी दिशा प्रदान करते हैं। शोध में बांस, कॉर्क, हेम्प–चूर्ण–कंक्रीट, माईसीलियम, पुनर्चक्रित प्लास्टिक, तैयार–मिश्रित कंक्रीट और टेराज़ो जैसी उभरती, वैकल्पिक और गैर–परंपरागत सामग्रियों का गहन तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। ये सभी सामग्री न केवल पर्यावरण–अनुकूल हैं, बल्कि कम ऊर्जा–आवश्यकता, दृढ़ता, किफायत और श्रेष्ठ यांत्रिक गुणों के कारण भविष्य की निर्माण–दुनिया के विश्वसनीय विकल्प बनकर उभर रही हैं।
अध्ययन की मुख्य विशेषताएँ अत्यंत प्रभावशाली हैं—
बांस को स्वाभाविक रूप से लचीला, मजबूत और आर्थिक दृष्टि से सबसे उपयुक्त सामग्री बताया गया है, जो टिकाऊ निर्माण का सशक्त आधार बन सकती है। हेम्प–चूर्ण–कंक्रीट को हल्की, दृढ़, दीर्घायु तथा उच्च ताप–निरोधक क्षमता वाली सामग्री के रूप में चिन्हित किया गया है।माईसीलियम को भविष्य की स्थायी निर्माण सामग्री के रूप में अत्यंत संभावनाशील बताया गया है, जो प्राकृतिक रूप से विकसित होने वाली जैव–आधारित तकनीक है।
पुनर्चक्रित प्लास्टिक को ईंट, टाइल, पाइप और चादरों के निर्माण में अत्यंत उपयोगी माना गया है, जो प्लास्टिक–अपशिष्ट प्रबंधन के समाधान के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यह शोध न केवल स्थायी निर्माण पद्धतियों के वैज्ञानिक आधार को सुदृढ़ करता है, बल्कि पर्यावरण–हितैषी भवन–निर्माण की दिशा में समाज को अधिक संवेदनशील और उत्तरदायी बनने का संदेश भी देता है। यह अध्ययन भविष्य की निर्माण–संस्कृति को नई दिशा प्रदान करने वाला प्रभावशाली दस्तावेज़ सिद्ध हो रहा है।

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