धरती के नीचे कोयला, ऊपर उठता विरोध —धरमजयगढ़ में विस्थापन विस्फोट की आहट ?
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धरमजयगढ़ की धरती एक बार फिर भारी औद्योगिक दबाव की कदमताल सुन रही है। अदानी समूह की पुरुंगा अंडरग्राउंड कोल माइंस को लेकर उठे गहन विरोध की प्रतिध्वनि अभी थमी भी नहीं थी कि इसी बीच दक्षिण पूर्वी कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) और कर्नाटक पावर कॉर्पोरेशन की ओर से नई खदानों का सर्वे शुरू होने की खबरों ने पूरे क्षेत्र में हलचल बढ़ा दी है। नई कोयला खदानों के प्रस्ताव और 56 गांवों पर संभावित असर की सूचना ने वातावरण में बेचैनी घोल दी है। यह केवल जमीन खोने का भय नहीं, बल्कि मिट्टी से जुड़े अस्तित्व, संस्कृति और जंगल आधारित जीवन के टूटने का संकट है। ग्रामीणों के मन में बड़ा सवाल उठ रहा है “क्या धरमजयगढ का अस्तित्व खतरे में नहीं , क्या वर्षों पुरानी पहचान और संस्कृति सुरक्षित रह पायेगी !
लोगों की नाराज़गी का सबसे बड़ा कारण स्पष्ट, लिखित और पारदर्शी नीति का अभाव है। ग्रामीणों का कहना है कि न तो भूमि अधिग्रहण का मुआवजा तय करने की प्रक्रिया स्पष्ट है, न विस्थापन के मानदंड बताए जा रहे हैं, और न ही पुनर्वास व रोजगार नीति की कोई आधिकारिक घोषणा। प्रशासन और कंपनियों की ओर से जानकारी के अभाव में अविश्वास गहराता जा रहा है, और विरोध स्वतः तेज होता प्रतीत हो रहा है। ग्रामीणों का मत स्पष्ट है कि आज के दौर में मुआवजा के लिये निर्धारित रकम जमीन, आजीविका और सांस्कृतिक विरासत के नुकसान की भरपाई तो दूर, सम्मानजनक विकल्प भी नहीं दे सकती।
धरमजयगढ़ अनुसूचित क्षेत्र है, जहां पेसा कानून ग्रामसभा को सर्वोच्च अधिकार देता है, लेकिन लोगों का आरोप है कि ग्रामसभाएं कागजी खानापूर्ति बनकर रह गई हैं। न अनुमति ली जाती है, न निर्णयों का पालन, और सर्वे कई बार बिना जानकारी के कर लिया जाता है। इसी वजह से अब ग्रामीण संगठनों ने “धरमजयगढ़ में पेसा पूर्ण रूप से लागू करो” अभियान आरंभ कर दिया है, और यह आंदोलन अब गांवों से निकलकर बड़े दायरे में आकार ले रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यह सिर्फ विकास का मुद्दा नहीं, बल्कि अधिकार और अस्तित्व की लड़ाई है, एक ऐसी लड़ाई, जिसमें वे खुद को मिट्टी से काटकर विकास की मशीन के हवाले नहीं कर सकते।

विशेषज्ञों का कहना है कि छह खदानों की शुरुआत के बाद भारी पैमाने पर वन कटाई, जलस्रोतों के दोहन, वन्यजीव मार्गों के टूटने और आदिवासी गांवों के पूर्ण विस्थापन जैसे खतरे लगभग तय हैं। स्थानीय लोग कहते हैं “हम विकास के विरोधी नहीं, पर हमारी जमीन, हमारी पहचान और हमारे अधिकार किसी कंपनी की बोली पर नहीं बिक सकते।” ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन कंपनियों के दबाव में काम कर रहा है, चुपचाप सर्वे करवाए जा रहे हैं, और लोगों की आवाज को नजरअंदाज किया जा रहा है। इसी के बीच अब सार्वजनिक अपील शुरू हो गई है “यदि पेसा का पालन नहीं हुआ, तो संघर्ष तेज होगा।”
धरमजयगढ़ आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है—एक पारंपरिक, जंगल आधारित पहाड़ी समाज अपने भविष्य और इतिहास दोनों को बचाने की कोशिश में है। प्रश्न अब केवल खेती की जमीन का नहीं, बल्कि पहचान, विरासत और आने वाली पीढ़ियों के हक का है। जिले की सीमाओं में उठ रही यह आवाज शायद आने वाले समय में पूरे प्रदेश में गूंजने वाली बड़ी लड़ाई का संकेत बन चुकी है।
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