दिन ब दिन खुल रही विकास के दावों की परतें !
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धरमजयगढ़ – पुरुँगा कोल ब्लॉक अब जनसुनवाई के दरवाज़े पर है, लेकिन इससे पहले ही कंपनी के तमाम दावों की परतें खुलने लगी हैं। विकास का जो चेहरा जनता को दिखाया जा रहा है, वह दरअसल जंगल, जल और ज़मीन के विनाश से सना हुआ है। दस्तावेज़ों में कंपनी ने जिस परियोजना को पर्यावरण हितैषी, रोजगार सृजक और स्थानीय जीवन के अनुकूल बताया है, उसी रिपोर्ट के पन्नों में सच्चाई छिपी है –
कंपनी का दावा है कि सतही खुदाई नहीं होगी, लेकिन उसके दस्तावेज़ों में साफ लिखा है कि आधारभूत संरचनाओं के लिए सतही जमीन का उपयोग किया जाएगा। यानि वहीं ज़मीन जहां आज भी जंगल के छोटे-बड़े झाड़, चारागाह और आदिवासियों के वन अधिकार पट्टे हैं, कल वहां मशीनें, स्टॉकयार्ड, सड़कें और कोयले के ढेर नजर आएंगे। विकास के नाम पर जो कुछ बचा है, वह है जंगल का विनाश और आज नहीं तो कल भू धसान, गिरते जल स्तर, घरों में दरारों के परिणाम स्वरुप ग्रामीण जीवन का विस्थापन।जिन वनों में अब तक लोगों का जीवन बसा था, वहां अब आधारभुत संरचना के नाम पर कथित विकास के नाम पर झूठ को वैधता दी जा रही है। सवाल यह है कि जब वन भूमि पर अतिक्रमण की अनुमति मिल जाएगी, तो क्या वनों की आत्मा बची रहेगी?
कंपनी के की जुबान पर विकास है, लेकिन ग्रामीणों की ज़ुबान पर चिंता। ब्लास्टिंग की आवाज़ें, ट्रकों की घरघराहट, खुदाई के कंपन से थरथराती ज़मीन — यही वह भविष्य है जिसकी रूपरेखा दस्तावेज़ों में नजर आ रही है। जलस्रोतों के नीचे जाने और भूजल स्तर में गिरावट का खतरा कंपनी जानती है, फिर भी रिपोर्टों में ‘न्यूनतम प्रभाव जैसे शब्द लिखे जाते
हैं! यह वैसा ही है जैसे यह कहना कि रात नहीं है क्योंकि हमने दीपक जला रखा है।
रोज़गार की बात कंपनी बार-बार दोहरा रही है, पर न रोजगार का प्रकार बताया गया है, न प्रक्रिया। “स्थानीयों को प्राथमिकता” जैसी बातें कहीं नजर नहीं आ रही हैं, यानि रोजगार नहीं, रोजगार का छलावा परोसा जा रहा है।
जनसुनवाई का उद्देश्य जनता की राय सुनना होता है, लेकिन यह तभी सार्थक है जब जनता को सच बताया जाए। क्या गाँव के लोगों को परियोजना के दस्तावेज़ उनकी भाषा में उपलब्ध कराए गए? क्या उन्हें बताया गया कि यह खदान कितनी भूमि निगलेगी, कितने पेड़ गिरेंगे, कितने घर उजड़ेंगे? क्या उन्हें यह भी बताया गया कि खदान की गहराई बढ़ने से भू-धसान और जलस्रोतों का सूखना तय है ? अगर नहीं, तो यह कहना अतिसंन्योक्ति नहीं होगा कि जनसुनवाई , लोगों को भ्रम में रखकर सिर्फ कुछ आंशिक रुप से कागजों में और मौखिक तौर पर अधूरी जानकारी देकर कराने की तैयारी है !
जनसुनवाई अब एक परीक्षा बन चुकी है — जिसमें यह देखा जाएगा कि क्या जनता की आवाज़ को दर्ज किया जायेगा, शंकाओं और समस्याओं का समाधान किया जायेगा या ई आई ए रिपोर्ट के आधार पर पहले से तय स्क्रिप्ट को ही मंजूरी दे दिया जायेगा। क्योंकि आज पुरुँगा की ज़मीन पर सिर्फ कोयले की खुदाई नहीं, सच्चाई और झूठ के बीच जंग भी शुरू हो चुकी है।
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