गोवर्धन पूजा : प्रकृति, परंपरा और संरक्षण का पर्व
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दीपावली के दूसरे दिन मनाया जाने वाला गोवर्धन पूजा भारतीय संस्कृति के उन दुर्लभ पर्वों में से है, जो हमें प्रकृति, पशु-संरक्षण, कृतज्ञता और सह-अस्तित्व का सशक्त संदेश देता है। यह पर्व मुख्यतः भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत की पूजा और इंद्र के अहंकार के दमन की स्मृति में मनाया जाता है। गोवर्धन पूजा हमें यह सिखाती है कि धरा ही धरणीश्वरी है—प्रकृति की रक्षा ही मानवता की रक्षा है।
💥गोवर्धन लीला का संदेश💥
कथा के अनुसार, ब्रजभूमि में लोग प्रतिवर्ष देव-राज इंद्र की पूजा कर वर्षा की कामना करते थे, पर श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि—जीवन का असली आधार बादल नहीं, प्रकृति है—पर्वत हैं, गौ-धन है, खेत-खलिहान हैं, वृक्ष-लताएँ हैं। जब ब्रजवासियों ने श्रीकृष्ण की प्रेरणा से गोवर्धन पर्वत की पूजा शुरू की, तो इंद्र ने क्रोधित होकर विनाशकारी वर्षा भेज दी। तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका (सबसे छोटी उंगली) पर धारण कर संपूर्ण ब्रज को बचाया। अंततः इंद्र का अहंकार टूटा और प्रकृति महिमा की जीत हुई।यह कथा प्रतीक है कि अहंकार पर विनम्रता की विजय होती है, प्रकृति का सम्मान, जीवन की सुरक्षा है, समाज की रक्षा में एकता सर्वोपरि है!
🐄पूजा की परंपरा और महत्त्व🐄
गोवर्धन पूजा के दिन घरों और गौशालाओं में विशेष सजावट की जाती है। गोबर से गोवर्धन पर्वत का प्रतीक बनाकर उसकी पूजा की जाती है। गोबर, भारतीय कृषि और ग्राम्य-जीवन में उर्वरता, पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। इस दिन अन्नकूट (56 भोग या विविध शाकाहारी पकवान) भगवान को अर्पित किया जाता है गाय-बैलों की पूजा कर उन्हें हरी चारा, गुड़ और दाना खिलाया जाता है
🔥 अन्न कूटकर, प्रकृति और अन्नदाता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है! यह परंपरा मनुष्य, पशु और प्रकृति—इन तीनों के अखंड संबंध को पुनः स्थापित करती है।
🔥आधुनिक समय में गोवर्धन पूजा का संदेश🔥
🌏🐄🐄🐄🐄🐄🐄🐄🐄🐄🐄🐄आज जब विश्व पर्यावरण संकटों से जूझ रहा है, गोवर्धन पूजा का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है
पर्यावरण संरक्षण गौ-पालन और पशुधन का सम्मान जैविक खेती व प्रकृति आधारित जीवन शैली समुदाय, सहयोग और संवेदना की संस्कृति का प्रतीक है!
यह पर्व हमें याद दिलाता है कि धरती संसाधन नहीं, माता है; पशु बोझ नहीं, जीवन-शक्ति हैं।
गोवर्धन पूजा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का सार है—जहाँ पूजा, प्रकृति-रक्षा से जुड़ती है और श्रद्धा, संवेदना का रूप लेती है। यह पर्व हमें ब्रज के उस मधुर संदेश से जोड़ता है कि
“प्रकृति का सम्मान ही भक्ति है, और संरक्षण ही सच्ची पूजा।”
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