धरमजयगढ़ में उबाल — अडानी की पुरंगा कोल खदान के खिलाफ, ग्रामीण बोले – “हमारे जल-जंगल-जमीन और हाथियों के घर को नहीं छूने देंगे”
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धरमजयगढ़ – धरमजयगढ़ अंचल के समरसिंघा, पुरंगा और तेंदुमुरी ग्राम पंचायतों में आज जनविरोध की आवाज़ गूंज उठी। हजारों ग्रामीणों ने एकजुट होकर अडानी समूह (मैसर्स अंबुजा सीमेंट्स लिमिटेड) की प्रस्तावित पुरंगा अंडरग्राउंड कोल ब्लॉक परियोजना के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया।
आदिवासी परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना के साथ शुरू हुई सभा में ग्रामीणों ने संकल्प लिया— “हम अपनी धरती, अपने जंगल और अपने हाथियों के घर को किसी कीमत पर उजड़ने नहीं देंगे।”
869 हेक्टेयर में फैली यह प्रस्तावित खदान पाँचवीं अनुसूचित क्षेत्र में आती है, जहाँ पेसा कानून 1996 और छत्तीसगढ़ पेसा कानून 2022 लागू हैं। खदान क्षेत्र में 387 हेक्टेयर वन भूमि और 314 हेक्टेयर आरक्षित वन शामिल है।
महिलाओं ने विरोध का अनोखा तरीका अपनाते हुए कंपनी द्वारा खुदवाए गए सामुदायिक भवन के गड्ढे को मिट्टी से भर दिया और कहा – “यह हमारी भूमि है, यहां कोई खदान नहीं खुलेगी।”
सभा में पहुंचे विधायक लालजीत सिंह राठिया ने ग्रामीणों के साथ एक स्वर में कहा कि “बिना ग्रामसभा की अनुमति, कोई परियोजना इस धरती पर कदम नहीं रख सकती।”धरमजयगढ़ वनमंडल, जो पहले से ही हाथियों के स्थायी आवास क्षेत्र के रूप में जाना जाता है, अब नई चुनौती के मुहाने पर खड़ा है। आंकड़े बताते हैं कि दो दशकों में 167 ग्रामीणों और 68 हाथियों की मौत यहां मानव-हाथी संघर्ष में हो चुकी है।
छाल रेंज का नाम पहले से ही हाथियों के “टापू” के रूप में लिया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह खदान शुरू हुई तो हाथियों का प्राकृतिक गलियारा टूट जाएगा और संघर्ष और भी भीषण रूप ले लेगा।
अब निगाहें शासन पर हैं— क्या वह जनभावनाओं और पर्यावरणीय चेतावनियों को समझेगा, या विकास की दौड़ में धरती की सांसें थम जाएंगी?
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