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हिंदी को राजभाषा से आगे राष्ट्रभाषा बनाना आज की मांग

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                                               राजकुमार पांडे

(हिन्दी दिवस पर संबोधन संस्थान द्वारा परिचर्चा आयोजित)

संभाग ब्यूरो दुर्गा गुप्ता

राजभाषा हिंदी को आगे बढ़कर राष्ट्रभाषा बनाना  आज की मांग है, यह तभी संभव है जब अपनी क्षेत्रीय भाषाओं के सम्मान के साथ-साथ हम  राजभाषा को हृदय से स्वीकार करें. उक्ताशय  के विचार संबोधन संस्थान द्वारा हिंदी दिवस पर आयोजित परिचर्चा में यूनिवर्सल विद्यालय के प्राचार्य श्री राजकुमार पांडे ने मुख्य अतिथि की आसंदी से व्यक्त किये, उन्होंने कहा कि विदेशों से आने वाले राजनयिक एवं राजनैतिक प्रतिनिधि अपने देश की भाषा में  बात करते हैं.  अपनी राजभाषा पर गर्व महसूस करते हुए जब भारत के हम सभी नागरिक इसे स्वीकार करेंगे तब इसे राष्ट्रभाषा बनने में देर नहीं लगेगी.

                         निदान सभागार , मनेन्द्रगढ़ में संबोधन साहित्य एवं कला विकास संस्थान मनेन्द्रगढ़ द्वारा हिंदी दिवस पर परिचर्चा एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया. 

“हिंदी आज के परिवेश में”  विषय पर आयोजित परिचर्चा  के संचालक बीरेन्द्र श्रीवास्तव ने उपस्थित विद्वान हिंदी प्रेमियों का स्वागत करते हुए कहा कि 1949 में घोषित राजभाषा हिन्दी आज भी अपने विकास के लिए भारत के नागरिकों से याचना कर रही है, जो चिंता का विषय है.  वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण केसरी ने पर चर्चा को आगे बढ़ते हुए कहा कि आगामी पीढ़ी की हिंदी के प्रति उदासीनता आज  चिंता का विषय है. हमारे घर में बच्चे हिन्दी की गिनती लिखना नहीं जानते.  आज भी हिन्दी  रोजगार की भाषा नहीं बन पाई है इसलिए अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों के प्रति लोगों का झुकाव हिंदी के विकास को प्रभावित कर रहा है.

                      सर्व आदिवासी समाज के संरक्षक परमेश्वर सिंह ने चर्चा को आगे बढ़ते हुए कहा कि क्षेत्रीय बोली और भाषाओं का भारत में पूरा सम्मान  है लेकिन उसे हिंदी की प्रतिस्पर्धा में खड़ा करना उचित नहीं है. चिंता के स्वर मे  उन्होंने कहा कि अंग्रेजी के कारण कई आदिवासी जातियां आज भी कानून के दृष्टि  से ओझल है. जिससे उनको मिलने वाली सुविधाएं प्रभावित हो रही हैं. आइसेक्ट के प्राचार्य श्री संजीव सिंह ने चिंता के स्वर में कहा कि बच्चों की  हिंदी इतनी कमजोर है कि डेढ़ अढ़ाई जैसे शब्द आज उनके प्रचलन में नहीं है. बाजारों में लगने वाले दुकानों के नाम यदि हिंदी में लिखे जाएं तो इससे भी हिंदी को बढ़ावा मिलेगा. कार्यक्रम के अध्यक्ष संजय सेंगर ने कहा कि हिन्दी भाषा के प्रति रुचि जागृत करने का दायित्व विद्यालयों का है जहां हिन्दी ऋतु एवंमाह तथा कैलेंडर जैसी जानकारी देकर भी हिंदी के प्रति उनकी रुचि जागृत की जानी चाहिए.  गोपाल बुनकर  ने चर्चा में भागीदारी करते हुए कहा की हिंदी की पत्र पत्रिकाओं के प्रकाशन में कमी हिंदी की स्थिति को स्पष्ट करता है. प्रमोद बंसल ने आशावादी शब्दों मे कहा कि  सद्भावना दर्पण सहित कई पत्र पत्रिकाएं आज  अन्य भाषाओं का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत कर रही है यह  हिंदी विकास के लिए अच्छा प्रयास है. वरिष्ठ साहित्यकार पुष्कर तिवारी ने देश के कई राज्यों में हिंदी के विरोध पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि किसी भी भाषा को राजनीतिक हथियार बनाना उचित नहीं.  अपने हित के लिए  भाषा का दुरुपयोग ना करें. वरिष्ठ साहित्यकार सतीश उपाध्याय ने चिंतित  स्वरों में कहा शैक्षणिक संस्थान हिंदी के विकास में अपनी अहम भूमिका निभा सकते हैं.

                  .  कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें नई पीढ़ी की रचनाकार इशिता सिंह  की सशक्त कविताओं की प्रस्तुति ने नई पीढ़ी में हिंदी के प्रति समर्पण  की आशा जनक तस्वीर प्रस्तुत की. साहित्यकार विजय गुप्ता,  सुषमा श्रीवास्तव, कल्याण केसरी की कविताओं ने श्रोताओं की तालियां बटोरी.  

                 कार्यक्रम के अंत में संस्था अध्यक्ष अनिल जैन ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन मे कहा कि  अब  भारत के बड़े बाजार में अपने पैर जमाने के लिए हिंदी सीखना जरूरी हो गया है यही कारण है कि आज विदेश में भी से भी उच्च संस्थानों में हिंदी पढ़ाई जा रही है. लेकिन हिंदी को अपने विकास के लिएअभी एक लंबी यात्रा तय करनी है.  इस कार्यक्रम में गोपाल बुनकर टी विजय गोपाल राव,संजीव सिंह, कल्याण केसरी, नवोदित कवियत्री इशिता सिंह, विजय गुप्ता, वीरेंद्र श्रीवास्तव, परमेश्वर सिंह, सतीश उपाध्याय, पवन श्रीवास्तव, पुष्कर तिवारी, प्रमोद बंसल, संजय सेंगर, राजकुमार पांडे, अनिल जैन की गौरवपूर्ण उपस्थिति मे संचालित कार्यक्रम का समापन कल्याण केसरी द्वारा उपस्थित सदस्यों के आभार प्रदर्शन के साथ किया गया. 

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